Money and Credit
आज हम जिस मुद्रा (Money) का उपयोग करते हैं, वह मानव सभ्यता के विकास का परिणाम है। प्राचीन काल में लोग वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) का उपयोग करते थे — अर्थात एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का आदान-प्रदान। लेकिन इस प्रणाली में कई कठिनाइयाँ थीं, जिसके कारण मुद्रा का आविष्कार हुआ।
मुद्रा के विकास ने आर्थिक लेन-देन को अत्यंत सरल बना दिया। आज मुद्रा विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange), मूल्य का मापक (Measure of Value) और मूल्य का संचय (Store of Value) — ये तीनों कार्य करती है। इस अध्याय में हम मुद्रा, बैंकिंग व्यवस्था और साख (Credit) के विभिन्न पहलुओं को समझेंगे।
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) में लोग सीधे वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। इसकी सबसे बड़ी समस्या आवश्यकताओं का दोहरा संयोग (Double Coincidence of Wants) थी — दो व्यक्तियों को एक-दूसरे की वस्तु की आवश्यकता एक ही समय पर होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि एक किसान के पास गेहूँ है और उसे कपड़े चाहिए, तो उसे ऐसे बुनकर की खोज करनी होगी जिसे गेहूँ की आवश्यकता हो।
आधुनिक मुद्रा (Modern Currency) सरकार द्वारा अधिकृत (Authorized) होती है। भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI — Reserve Bank of India) मुद्रा जारी करता है। करेंसी नोट और सिक्कों को कोई भी व्यक्ति भुगतान के रूप में स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकता — इसे वैध मुद्रा (Legal Tender) कहते हैं।
बैंक (Banks) आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बैंक लोगों से जमा (Deposits) स्वीकार करते हैं और उन पर ब्याज (Interest) देते हैं। जमा राशि का एक छोटा हिस्सा (लगभग 15%) बैंक अपने पास नकद आरक्षित (Cash Reserve) के रूप में रखते हैं ताकि जमाकर्ताओं की दैनिक निकासी (Withdrawal) की माँग पूरी हो सके।
शेष राशि (लगभग 85%) बैंक ऋण (Loans) के रूप में उन लोगों को देते हैं जिन्हें धन की आवश्यकता है। बैंक ऋण पर जमा ब्याज दर से अधिक ब्याज लेते हैं — यही अंतर बैंक की आय (Income) का प्रमुख स्रोत है। इस प्रकार बैंक मध्यस्थ (Intermediary) का कार्य करते हैं — जमाकर्ताओं और उधारकर्ताओं के बीच।
साख (Credit) का अर्थ है उधार लेना और देना। जब कोई व्यक्ति किसी बैंक या साहूकार से ऋण लेता है तो उसे कुछ शर्तों को पूरा करना होता है — इन्हें ऋण की शर्तें (Terms of Credit) कहते हैं।
साख की दो भूमिकाएँ हो सकती हैं — सकारात्मक और नकारात्मक। यदि ऋण का उपयोग उत्पादक कार्यों (जैसे खेती, व्यापार) में हो और आय बढ़े, तो साख लाभदायक है। लेकिन यदि फसल खराब हो जाए या व्यापार में हानि हो, तो ऋणी कर्ज के जाल (Debt Trap) में फँस सकता है।
भारत में साख के दो स्रोत हैं — औपचारिक (Formal) और अनौपचारिक (Informal)।
औपचारिक स्रोत में बैंक और सहकारी समितियाँ (Cooperative Societies) आती हैं। इनकी गतिविधियों की निगरानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) करता है। RBI यह सुनिश्चित करता है कि बैंक केवल लाभदायक व्यक्तियों को ही नहीं बल्कि छोटे किसानों, छोटे व्यापारियों और गरीबों को भी ऋण दें। औपचारिक स्रोतों में ब्याज दर कम और नियंत्रित होती है।
अनौपचारिक स्रोत में साहूकार (Moneylenders), व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार और मित्र आते हैं। इन पर RBI का कोई नियंत्रण नहीं है। ये बहुत ऊँची ब्याज दर वसूलते हैं और कभी-कभी ऋणी का शोषण करते हैं। ग्रामीण भारत में अभी भी लगभग 85% ऋण अनौपचारिक स्रोतों से लिया जाता है।
स्वयं सहायता समूह (SHGs) गरीबों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के लिए ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करने का एक प्रभावी तरीका है। एक SHG में सामान्यतः 15-20 सदस्य होते हैं जो नियमित रूप से बचत करते हैं और एक-दूसरे को छोटे ऋण देते हैं।
इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक (Grameen Bank) है जिसकी स्थापना प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस ने की थी। उन्हें इसके लिए 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। भारत में भी SHG आंदोलन ने ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं को सूक्ष्म वित्त (Microfinance) उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वस्तु विनिमय प्रणाली वह प्रणाली है जिसमें एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का सीधा आदान-प्रदान किया जाता है, बिना मुद्रा के उपयोग के। इसकी प्रमुख सीमाएँ:
इन्हीं समस्याओं के कारण मुद्रा का आविष्कार हुआ।
बैंक जमाकर्ताओं (Depositors) और उधारकर्ताओं (Borrowers) के बीच मध्यस्थ का कार्य करते हैं:
इस प्रकार बैंक बचत को निवेश में बदलने का कार्य करते हैं, जो अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक है।
जमानत (Collateral) वह संपत्ति या मूल्यवान वस्तु है जो ऋणी (Borrower) ऋणदाता (Lender) को ऋण की गारंटी के रूप में देता है। यदि ऋणी ऋण वापस नहीं कर पाता, तो ऋणदाता जमानत पर अधिकार जमा सकता है।
जमानत के उदाहरण: जमीन, मकान, वाहन, गोदाम का माल, सोना-चांदी, बैंक जमा, बीमा पॉलिसी।
महत्व: जमानत ऋणदाता के लिए सुरक्षा (Security) प्रदान करती है। बिना जमानत के ऋण प्राप्त करना कठिन होता है, विशेषकर औपचारिक स्रोतों से। यही कारण है कि गरीबों को बैंक ऋण मिलना कठिन है क्योंकि उनके पास जमानत देने के लिए संपत्ति नहीं होती।
स्वयं सहायता समूह (SHG) गरीबों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने का प्रभावी तरीका है:
मुद्रा के तीन प्रमुख कार्य हैं: (1) विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange) — वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री में माध्यम, (2) मूल्य का मापक (Measure of Value) — सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य मुद्रा में व्यक्त किया जाता है, (3) मूल्य का संचय (Store of Value) — मुद्रा को बचत के रूप में संग्रहित किया जा सकता है, जबकि नाशवान वस्तुओं को नहीं।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है और सभी वाणिज्यिक बैंकों का नियामक (Regulator) है। RBI: (1) बैंकों को लाइसेंस देता है, (2) नकद आरक्षित अनुपात (CRR) निर्धारित करता है, (3) बैंकों को यह सुनिश्चित करने को कहता है कि वे गरीबों और छोटे किसानों को भी ऋण दें — प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending), (4) बैंकों की वित्तीय स्थिति की नियमित जाँच करता है।
लाभदायक: जब ऋण का उपयोग उत्पादक कार्यों (खेती, व्यापार, उद्योग) में हो और आय बढ़े — तो ऋणी आसानी से ऋण चुका सकता है और उसकी स्थिति में सुधार होता है। हानिकारक: जब फसल खराब हो जाए, व्यापार में हानि हो, या ऋण का उपयोग अनुत्पादक कार्यों (शादी, उत्सव) में हो — तो ऋणी ऋण नहीं चुका पाता और कर्ज के जाल (Debt Trap) में फँस जाता है, विशेषकर अनौपचारिक स्रोतों की ऊँची ब्याज दर के कारण।
भारत में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अनौपचारिक साख स्रोतों (साहूकार, व्यापारी) पर अत्यधिक निर्भरता है। यह निम्न कारणों से हानिकारक है:
उपाय: