Resources and Development
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है और जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, उसे संसाधन (Resource) कहते हैं। संसाधन मानव और प्रकृति की परस्पर क्रिया का परिणाम होते हैं। प्रकृति में कोई भी वस्तु तब तक संसाधन नहीं बनती जब तक मनुष्य उसका उपयोग करने की तकनीक नहीं खोज लेता।
संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है — उत्पत्ति के आधार पर (जैव/अजैव), समाप्यता के आधार पर (नवीकरणीय/अनवीकरणीय), स्वामित्व के आधार पर (व्यक्तिगत/सामुदायिक/राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय) और विकास के स्तर के आधार पर (संभावी/विकसित/भंडार/संचित कोष)।
संसाधनों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है — प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources), मानव-निर्मित संसाधन (Human-made Resources) और मानव संसाधन (Human Resources)। प्राकृतिक संसाधन वे हैं जो प्रकृति से प्राप्त होते हैं जैसे वायु, जल, मृदा, खनिज आदि। मानव-निर्मित संसाधन वे हैं जिन्हें मनुष्य ने प्रौद्योगिकी से बनाया है जैसे मशीनें, भवन, सड़कें।
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources) किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति होते हैं। सामुदायिक संसाधन (Community Resources) समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते हैं जैसे चरागाह, श्मशान, तालाब। राष्ट्रीय संसाधन (National Resources) देश की सीमा के भीतर सभी संसाधन सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources) — तट रेखा से 200 समुद्री मील (Exclusive Economic Zone) के बाहर खुले महासागरीय संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं।
भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों का वितरण असमान है। कुछ क्षेत्र संसाधन-समृद्ध हैं जबकि अन्य संसाधन-विहीन। इसलिए संसाधन नियोजन (Resource Planning) अत्यंत आवश्यक है। भारत में संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन चरण शामिल हैं।
सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development)का अर्थ ऐसा विकास है जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है, साथ ही भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता नहीं करता है। यह प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, सामाजिक समानता और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाता है। 1992 के रियो डी जनेरियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) में सतत् विकास को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया गया। एजेंडा 21 में सतत् विकास के लिए वैश्विक सहयोग पर बल दिया गया।
भूमि (Land) एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी है, लेकिन इसमें से लगभग 93% भूमि का ही विश्वसनीय आँकड़ा उपलब्ध है। भूमि उपयोग प्रारूप (Land Use Pattern) कई कारकों पर निर्भर करता है जैसे — भू-आकृति, जलवायु, मृदा प्रकार और मानवीय गतिविधियाँ।
भारत में बंजर भूमि (Wasteland) और परती भूमि (Fallow Land) का प्रतिशत चिंताजनक है। भूमि क्षरण (Land Degradation) के प्रमुख कारण हैं — वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, अत्यधिक सिंचाई, खनन और औद्योगीकरण। भूमि संरक्षण के लिए वनरोपण, चराई पर नियंत्रण और उचित भूमि उपयोग नियोजन आवश्यक है।
मृदा (Soil) सबसे महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है। यह खाद्य उत्पादन, पशुपालन और वनस्पति विकास का आधार है। मृदा का निर्माण लाखों वर्षों की भू-गर्भिक, जलवायविक और जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम है। भारत में विभिन्न भू-आकृतियों और जलवायु के कारण अनेक प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं।
मृदा अपरदन (Soil Erosion) वह प्रक्रिया है जिसमें मृदा की ऊपरी परत हवा, जल या अन्य कारकों से कट-बहकर नष्ट हो जाती है। मृदा अपरदन के प्रमुख कारणों में वनों की कटाई (Deforestation), अत्यधिक चराई (Overgrazing), अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, खनन और निर्माण कार्य शामिल हैं। नदियों द्वारा मृदा अपरदन से बीहड़ भूमि (Badland/Ravines) का निर्माण होता है — चंबल बेसिन इसका प्रमुख उदाहरण है।
मृदा संरक्षण न केवल कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और सतत् विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह मृदा संसाधनों के संरक्षण में योगदान दे।
सही उत्तर: (c) अनवीकरणीय (Non-renewable)
लौह अयस्क एक खनिज संसाधन है जो सीमित मात्रा में उपलब्ध है और एक बार उपयोग के बाद पुनः निर्मित नहीं होता। इसलिए यह अनवीकरणीय संसाधन है।
संसाधन नियोजन वह प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों का समुचित उपयोग, सही वितरण और भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।
भारत में आवश्यकता:
सतत् पोषणीय विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करे बिना भावी पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति की क्षमता को नुकसान पहुँचाए।
भारत में मुख्य रूप से छह प्रकार की मृदाएँ पायी जाती हैं:
मृदा अपरदन के कारण:
रोकथाम के उपाय:
(1) संसाधनों की पहचान और सूचीकरण — सर्वेक्षण, मानचित्रण, गुणात्मक-मात्रात्मक अनुमान। (2) उचित प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढाँचा तैयार करना। (3) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।
बांगर (Bangar): पुरानी जलोढ़ मृदा — बाढ़ के मैदान से दूर ऊँचे भागों में — कंकड़ ग्रंथियाँ (Kankar) पाई जाती हैं — अपेक्षाकृत कम उपजाऊ। खादर (Khadar): नई जलोढ़ मृदा — बाढ़ के मैदानों में प्रतिवर्ष नई परत जमा होती है — अधिक उपजाऊ और महीन कणों वाली।
आश्रय मेखला का अर्थ है खेतों की सीमाओं पर पेड़ों की कतारें लगाना। ये पेड़ तेज हवाओं की गति को कम करते हैं जिससे पवन अपरदन (Wind Erosion) रुकता है। पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान में, इस विधि का व्यापक उपयोग किया जाता है। इसे वायुरोधक (Windbreaks) भी कहते हैं।
भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है जहाँ संसाधनों का वितरण अत्यंत असमान है। संसाधन नियोजन निम्न कारणों से महत्वपूर्ण है:
अतः भारत में संसाधन नियोजन आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संतुलन — तीनों के लिए अनिवार्य है।