📍 School Code: 220736 | Samdari, Balotra, Rajasthan 📧 gsssjethantri@gmail.com
Home / Resources / Social Science / भूगोल / अध्याय 1
अध्याय 1 · भूगोल · कक्षा 10

संसाधन एवं विकास

Resources and Development

1. परिचय — संसाधन क्या हैं?

हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है और जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, उसे संसाधन (Resource) कहते हैं। संसाधन मानव और प्रकृति की परस्पर क्रिया का परिणाम होते हैं। प्रकृति में कोई भी वस्तु तब तक संसाधन नहीं बनती जब तक मनुष्य उसका उपयोग करने की तकनीक नहीं खोज लेता।

संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है — उत्पत्ति के आधार पर (जैव/अजैव), समाप्यता के आधार पर (नवीकरणीय/अनवीकरणीय), स्वामित्व के आधार पर (व्यक्तिगत/सामुदायिक/राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय) और विकास के स्तर के आधार पर (संभावी/विकसित/भंडार/संचित कोष)।

📌 संसाधनों का वर्गीकरण — प्रमुख आधार:

  • उत्पत्ति: जैव संसाधन (Biotic) — पेड़-पौधे, जीव-जंतु | अजैव संसाधन (Abiotic) — खनिज, मिट्टी, जल
  • समाप्यता: नवीकरणीय (Renewable) — सौर ऊर्जा, वन | अनवीकरणीय (Non-renewable) — कोयला, पेट्रोलियम
  • स्वामित्व: व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय
  • विकास स्तर: संभावी (Potential), विकसित (Developed), भंडार (Stock), संचित कोष (Reserve)

2. संसाधनों के प्रकार

संसाधनों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है — प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources), मानव-निर्मित संसाधन (Human-made Resources) और मानव संसाधन (Human Resources)। प्राकृतिक संसाधन वे हैं जो प्रकृति से प्राप्त होते हैं जैसे वायु, जल, मृदा, खनिज आदि। मानव-निर्मित संसाधन वे हैं जिन्हें मनुष्य ने प्रौद्योगिकी से बनाया है जैसे मशीनें, भवन, सड़कें।

स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources) किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति होते हैं। सामुदायिक संसाधन (Community Resources) समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते हैं जैसे चरागाह, श्मशान, तालाब। राष्ट्रीय संसाधन (National Resources) देश की सीमा के भीतर सभी संसाधन सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources) — तट रेखा से 200 समुद्री मील (Exclusive Economic Zone) के बाहर खुले महासागरीय संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं।

विकास के स्तर पर आधारित संसाधन:

  • संभावी संसाधन (Potential Resources): किसी क्षेत्र में मौजूद लेकिन अभी उपयोग न किए गए — जैसे राजस्थान और गुजरात में पवन एवं सौर ऊर्जा की अपार संभावना
  • विकसित संसाधन (Developed Resources): जिनका सर्वेक्षण हो चुका है और उपयोग की गुणवत्ता एवं मात्रा निर्धारित है
  • भंडार (Stock): पर्यावरण में उपलब्ध लेकिन उपयोग की तकनीक ज्ञात नहीं — जैसे हाइड्रोजन ऊर्जा
  • संचित कोष (Reserve): भंडार का वह भाग जिसे उपलब्ध तकनीक से उपयोग किया जा सकता है लेकिन अभी शुरू नहीं हुआ

3. संसाधनों का विकास — संसाधन नियोजन

भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों का वितरण असमान है। कुछ क्षेत्र संसाधन-समृद्ध हैं जबकि अन्य संसाधन-विहीन। इसलिए संसाधन नियोजन (Resource Planning) अत्यंत आवश्यक है। भारत में संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन चरण शामिल हैं।

📌 संसाधन नियोजन के तीन चरण:

  • प्रथम चरण: देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान एवं सूचीबद्ध करना (Inventory of resources)
  • द्वितीय चरण: संसाधन विकास योजना हेतु उचित प्रौद्योगिकी, कौशल एवं संस्थागत ढाँचा तैयार करना
  • तृतीय चरण: संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना

सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development)का अर्थ ऐसा विकास है जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है, साथ ही भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता नहीं करता है। यह प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, सामाजिक समानता और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाता है। 1992 के रियो डी जनेरियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) में सतत् विकास को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया गया। एजेंडा 21 में सतत् विकास के लिए वैश्विक सहयोग पर बल दिया गया।

4. भू-संसाधन / भूमि उपयोग

भूमि (Land) एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी है, लेकिन इसमें से लगभग 93% भूमि का ही विश्वसनीय आँकड़ा उपलब्ध है। भूमि उपयोग प्रारूप (Land Use Pattern) कई कारकों पर निर्भर करता है जैसे — भू-आकृति, जलवायु, मृदा प्रकार और मानवीय गतिविधियाँ।

भारत में भूमि उपयोग (Land Use Pattern in India):

  • वन क्षेत्र: कुल क्षेत्रफल का लगभग 22.5% (राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार 33% होना चाहिए)
  • कृषि योग्य बंजर भूमि (Culturable Wasteland): वह भूमि जो कृषि के लिए उपयुक्त है लेकिन 5 वर्षों से अधिक समय से खेती नहीं हो रही
  • वर्तमान परती भूमि (Current Fallow): एक कृषि वर्ष या उससे कम समय से बिना जुताई की भूमि
  • अन्य परती भूमि (Other Fallow): 1-5 वर्षों से बिना जुताई की भूमि
  • शुद्ध बोया गया क्षेत्र (Net Sown Area): लगभग 43% — जिस पर वास्तव में खेती होती है

भारत में बंजर भूमि (Wasteland) और परती भूमि (Fallow Land) का प्रतिशत चिंताजनक है। भूमि क्षरण (Land Degradation) के प्रमुख कारण हैं — वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, अत्यधिक सिंचाई, खनन और औद्योगीकरण। भूमि संरक्षण के लिए वनरोपण, चराई पर नियंत्रण और उचित भूमि उपयोग नियोजन आवश्यक है।

5. मृदा संसाधन

मृदा (Soil) सबसे महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है। यह खाद्य उत्पादन, पशुपालन और वनस्पति विकास का आधार है। मृदा का निर्माण लाखों वर्षों की भू-गर्भिक, जलवायविक और जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम है। भारत में विभिन्न भू-आकृतियों और जलवायु के कारण अनेक प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं।

📌 भारत की प्रमुख मृदाएँ:

  • जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil): सबसे अधिक उपजाऊ, गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान में — बांगर (पुरानी) और खादर (नई जलोढ़)
  • काली मृदा (Black/Regur Soil): कपास की खेती के लिए उत्तम, दक्कन पठार — महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश
  • लाल एवं पीली मृदा (Red & Yellow Soil): दक्कन पठार के पूर्वी भाग, ओडिशा, छत्तीसगढ़ — लोहे के ऑक्सीकरण से लाल रंग
  • लैटेराइट मृदा (Laterite Soil): भारी वर्षा क्षेत्रों में — कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु — चाय की खेती के लिए उपयुक्त
  • शुष्क मृदा (Arid/Desert Soil): राजस्थान — रेतीली, नमक की अधिकता, कम ह्यूमस
  • वन मृदा (Forest Soil): पर्वतीय क्षेत्रों में — अम्लीय, ह्यूमस समृद्ध, ढालों पर दोमट

6. मृदा अपरदन एवं संरक्षण

मृदा अपरदन (Soil Erosion) वह प्रक्रिया है जिसमें मृदा की ऊपरी परत हवा, जल या अन्य कारकों से कट-बहकर नष्ट हो जाती है। मृदा अपरदन के प्रमुख कारणों में वनों की कटाई (Deforestation), अत्यधिक चराई (Overgrazing), अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, खनन और निर्माण कार्य शामिल हैं। नदियों द्वारा मृदा अपरदन से बीहड़ भूमि (Badland/Ravines) का निर्माण होता है — चंबल बेसिन इसका प्रमुख उदाहरण है।

📌 मृदा संरक्षण के उपाय:

  • समोच्च जुताई (Contour Ploughing): पहाड़ी ढालों पर समोच्च रेखाओं के अनुसार जुताई करना — जल प्रवाह की गति कम होती है
  • सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming): पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाना — पानी का बहाव धीमा होता है
  • पट्टी कृषि (Strip Cropping): बड़े खेतों में फसलों की पट्टियाँ बनाकर बीच में घास उगाना
  • आश्रय मेखला (Shelter Belts): खेतों के किनारे पेड़ों की कतारें लगाना — हवा की गति कम होती है
  • वनरोपण (Afforestation): अधिक से अधिक पेड़ लगाना
  • अत्यधिक चराई पर रोक और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ अपनाना

मृदा संरक्षण न केवल कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और सतत् विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह मृदा संसाधनों के संरक्षण में योगदान दे।

⚡ त्वरित पुनरावृत्ति — Quick Revision

📌 संसाधनों के प्रकार — सारणी

  • उत्पत्ति: जैव (Biotic) — वन, जीव-जंतु | अजैव (Abiotic) — खनिज, धातु
  • समाप्यता: नवीकरणीय (Renewable) — सौर, वायु | अनवीकरणीय (Non-renewable) — कोयला, पेट्रोलियम
  • स्वामित्व: व्यक्तिगत → सामुदायिक → राष्ट्रीय → अंतर्राष्ट्रीय
  • विकास: संभावी → विकसित → भंडार → संचित कोष

📌 मृदा प्रकार — सारांश

  • जलोढ़ (Alluvial): उत्तर भारत का मैदान — सर्वाधिक उपजाऊ — बांगर/खादर
  • काली (Black/Regur): दक्कन पठार — कपास के लिए उत्तम — नमी धारण क्षमता उच्च
  • लाल-पीली (Red): दक्कन पूर्वी भाग — लोहे के ऑक्सीकरण से रंग
  • लैटेराइट (Laterite): भारी वर्षा क्षेत्र — चाय/काजू के लिए उपयुक्त
  • शुष्क (Arid): राजस्थान — रेतीली, कम ह्यूमस
  • वन (Forest): पर्वतीय — अम्लीय, ह्यूमस युक्त

📌 भूमि उपयोग आँकड़े

  • कुल भौगोलिक क्षेत्रफल: 32.8 लाख वर्ग किमी
  • वन क्षेत्र: लगभग 22.5% (लक्ष्य 33%)
  • शुद्ध बोया गया क्षेत्र: लगभग 43%
  • बंजर भूमि + परती: चिंताजनक स्तर पर
  • संसाधन नियोजन: 3 चरण — पहचान → तकनीक → समन्वय

📌 मुख्य शब्दावली

  • संसाधन (Resource): पर्यावरण में उपलब्ध उपयोगी वस्तु
  • सतत् विकास (Sustainable Development): भावी पीढ़ी की जरूरतों से बिना समझौता किए वर्तमान की पूर्ति
  • एजेंडा 21: रियो सम्मेलन 1992 — सतत् विकास हेतु वैश्विक कार्ययोजना
  • बांगर (Bangar): पुरानी जलोढ़ मृदा — ऊँचे भागों में
  • खादर (Khadar): नई जलोढ़ मृदा — बाढ़ मैदानों में — अधिक उपजाऊ
  • बीहड़ (Ravines): नदियों द्वारा अपरदन से बनी बंजर भूमि

📖 पाठ्यपुस्तक प्रश्न-उत्तर — NCERT Solutions

प्रश्न 1: बहुविकल्पीय — लौह अयस्क किस प्रकार का संसाधन है? (a) नवीकरणीय (b) जैव (c) अनवीकरणीय (d) प्रवाह

सही उत्तर: (c) अनवीकरणीय (Non-renewable)

लौह अयस्क एक खनिज संसाधन है जो सीमित मात्रा में उपलब्ध है और एक बार उपयोग के बाद पुनः निर्मित नहीं होता। इसलिए यह अनवीकरणीय संसाधन है।

प्रश्न 2: संसाधन नियोजन (Resource Planning) क्या है? भारत में संसाधन नियोजन की आवश्यकता क्यों है?

संसाधन नियोजन वह प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों का समुचित उपयोग, सही वितरण और भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।

भारत में आवश्यकता:

  • संसाधनों का असमान वितरण — झारखंड खनिज-समृद्ध लेकिन अराकू घाटी अलग स्थिति में
  • कुछ राज्य संसाधन-समृद्ध लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े
  • तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण संसाधनों पर बढ़ता दबाव
  • सतत् विकास के लिए नियोजन अनिवार्य
प्रश्न 3: सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development) की अवधारणा को स्पष्ट करें।

सतत् पोषणीय विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करे बिना भावी पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति की क्षमता को नुकसान पहुँचाए।

  • 1987 में ब्रंटलैंड आयोग ने यह अवधारणा प्रस्तुत की
  • 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में 172 देशों ने एजेंडा 21 को स्वीकार किया
  • संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और प्रदूषण नियंत्रण इसके मूल सिद्धांत हैं
  • वैश्विक सहयोग, स्थानीय भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण इसके प्रमुख स्तंभ हैं
प्रश्न 4: भारत में पायी जाने वाली विभिन्न प्रकार की मृदाओं का वर्णन करें।

भारत में मुख्य रूप से छह प्रकार की मृदाएँ पायी जाती हैं:

  • जलोढ़ मृदा: उत्तर भारत के विशाल मैदान — सबसे उपजाऊ, बांगर (पुरानी) और खादर (नई) दो प्रकार
  • काली मृदा: दक्कन पठार — कपास उत्पादन हेतु सर्वोत्तम, नमी धारण क्षमता अधिक
  • लाल-पीली मृदा: दक्कन पठार का पूर्वी भाग — लोहे के ऑक्सीकरण से लाल रंग
  • लैटेराइट मृदा: उष्ण कटिबंधीय भारी वर्षा क्षेत्र — ह्यूमस कम, चाय की खेती
  • शुष्क मृदा: पश्चिमी राजस्थान — रेतीली, लवणीय, कम उपजाऊ
  • वन मृदा: पर्वतीय वन क्षेत्र — ह्यूमस समृद्ध, ऊँचाई पर अम्लीय
प्रश्न 5: मृदा अपरदन (Soil Erosion) के कारण एवं उसकी रोकथाम के उपाय बताएँ।

मृदा अपरदन के कारण:

  • वनों की अंधाधुंध कटाई (Deforestation)
  • पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई (Overgrazing)
  • अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ
  • खनन और निर्माण कार्य
  • तीव्र वर्षा और बाढ़

रोकथाम के उपाय:

  • समोच्च जुताई — ढालों के अनुप्रस्थ दिशा में जुताई
  • सीढ़ीदार खेती — पहाड़ी क्षेत्रों में प्रभावी
  • पट्टी कृषि — फसलों के बीच घास की पट्टियाँ
  • आश्रय मेखला — पेड़ों की कतारें लगाना
  • वनरोपण और अत्यधिक चराई पर प्रतिबंध

🎯 प्रश्न बैंक — Question Bank

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. रियो डी जनेरियो पृथ्वी सम्मेलन किस वर्ष हुआ?
  • A) 1987
  • B) 1990
  • C) 1992
  • D) 2002
✅ सही उत्तर: C) 1992 — रियो डी जनेरियो (ब्राजील) में 1992 में पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) हुआ जिसमें 172 देशों ने भाग लिया और एजेंडा 21 को स्वीकार किया।
2. काली मृदा (Black Soil) किस फसल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है?
  • A) कपास
  • B) चाय
  • C) गेहूँ
  • D) चावल
✅ सही उत्तर: A) कपास — काली मृदा (Regur Soil) कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम है। इसलिए इसे "काली कपास मृदा" (Black Cotton Soil) भी कहते हैं।
3. जलोढ़ मृदा के दो प्रकार कौन-से हैं?
  • A) लाल और काली
  • B) बांगर और खादर
  • C) बलुई और दोमट
  • D) अम्लीय और क्षारीय
✅ सही उत्तर: B) बांगर और खादर — बांगर पुरानी जलोढ़ मृदा है जो ऊँचे भागों में पाई जाती है। खादर नई जलोढ़ मृदा है जो बाढ़ मैदानों में जमा होती है और अधिक उपजाऊ होती है।
4. पहाड़ी ढालों पर समोच्च रेखाओं के अनुसार की जाने वाली जुताई को क्या कहते हैं?
  • A) पट्टी कृषि
  • B) सीढ़ीदार खेती
  • C) स्थानांतरी खेती
  • D) समोच्च जुताई
✅ सही उत्तर: D) समोच्च जुताई (Contour Ploughing) — पहाड़ी ढालों पर समोच्च रेखाओं के अनुसार जुताई करने से जल प्रवाह की गति कम होती है और मृदा अपरदन रुकता है।
5. निम्न में से कौन-सा नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resource) है?
  • A) कोयला
  • B) पेट्रोलियम
  • C) सौर ऊर्जा
  • D) प्राकृतिक गैस
✅ सही उत्तर: C) सौर ऊर्जा — सौर ऊर्जा एक नवीकरणीय संसाधन है जो असीमित मात्रा में उपलब्ध है। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस अनवीकरणीय संसाधन हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer)

1. संसाधन नियोजन के तीन चरण कौन-से हैं?

(1) संसाधनों की पहचान और सूचीकरण — सर्वेक्षण, मानचित्रण, गुणात्मक-मात्रात्मक अनुमान। (2) उचित प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढाँचा तैयार करना। (3) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।

2. बांगर और खादर में अंतर बताइए।

बांगर (Bangar): पुरानी जलोढ़ मृदा — बाढ़ के मैदान से दूर ऊँचे भागों में — कंकड़ ग्रंथियाँ (Kankar) पाई जाती हैं — अपेक्षाकृत कम उपजाऊ। खादर (Khadar): नई जलोढ़ मृदा — बाढ़ के मैदानों में प्रतिवर्ष नई परत जमा होती है — अधिक उपजाऊ और महीन कणों वाली।

3. आश्रय मेखला (Shelter Belt) क्या है और यह कैसे मृदा अपरदन रोकती है?

आश्रय मेखला का अर्थ है खेतों की सीमाओं पर पेड़ों की कतारें लगाना। ये पेड़ तेज हवाओं की गति को कम करते हैं जिससे पवन अपरदन (Wind Erosion) रुकता है। पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान में, इस विधि का व्यापक उपयोग किया जाता है। इसे वायुरोधक (Windbreaks) भी कहते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer)

1. 'संसाधन नियोजन भारत जैसे देश में अत्यंत महत्वपूर्ण है।' इस कथन को भारत के संदर्भ में समझाइए।

भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है जहाँ संसाधनों का वितरण अत्यंत असमान है। संसाधन नियोजन निम्न कारणों से महत्वपूर्ण है:

  • असमान वितरण: राजस्थान में सौर ऊर्जा और खनिज अधिक हैं लेकिन जल संसाधन कम। अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर हैं लेकिन बुनियादी ढाँचे की कमी है। झारखंड खनिज-समृद्ध है फिर भी आर्थिक रूप से पिछड़ा।
  • जनसंख्या दबाव: 140 करोड़ से अधिक जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति संसाधन उपलब्धता घट रही है। नियोजन के बिना संसाधन शीघ्र समाप्त हो सकते हैं।
  • सतत् विकास: एजेंडा 21 और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुसार भावी पीढ़ियों के लिए संसाधन सुरक्षित रखना आवश्यक है।
  • पर्यावरण संरक्षण: अनियोजित दोहन से प्रदूषण, वन-ह्रास और मृदा अपरदन जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।
  • क्षेत्रीय असंतुलन: कुछ क्षेत्रों का अत्यधिक दोहन और कुछ का अविकसित रहना — नियोजन से यह संतुलन बनाया जा सकता है।

अतः भारत में संसाधन नियोजन आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संतुलन — तीनों के लिए अनिवार्य है।

← सभी अध्याय अध्याय 2: वन एवं वन्य जीव संसाधन →