Popular Struggles and Movements
लोकतंत्र का विकास केवल चुनावों और संस्थाओं से नहीं होता, बल्कि जन-संघर्षों और आन्दोलनों (Popular Struggles and Movements) के माध्यम से भी होता है। जब सरकारें जनता की उपेक्षा करती हैं या अलोकतांत्रिक तरीके अपनाती हैं, तो लोग संगठित होकर प्रतिरोध करते हैं। यह प्रतिरोध ही लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
इस अध्याय में हम दो महत्वपूर्ण उदाहरणों — नेपाल का जन-आन्दोलन (2006) और बोलीविया का जल युद्ध (2000) — के माध्यम से समझेंगे कि जन-संघर्ष लोकतंत्र को कैसे गहरा और मजबूत बनाते हैं। साथ ही हम दबाव समूहों (Pressure Groups) और आन्दोलनों की भूमिका को भी समझेंगे।
नेपाल में राजा ज्ञानेन्द्र (King Gyanendra) ने 2005 में संसद को भंग करके सारी शक्तियाँ अपने हाथ में ले लीं — यह एक शाही तख्तापलट (Royal Coup) था। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाई और राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार किया। इसके विरोध में सप्तदलीय गठबंधन (SPA — Seven Party Alliance) और माओवादी गुरिल्लाओं ने मिलकर एक व्यापक आन्दोलन शुरू किया।
अप्रैल 2006 में नेपाल की राजधानी काठमांडू और अन्य शहरों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। कर्फ्यू और गोलीबारी के बावजूद जनता पीछे नहीं हटी। अंततः राजा को झुकना पड़ा — संसद बहाल की गई, SPA सरकार बनी, और राजा की अधिकांश शक्तियाँ छीन ली गईं। बाद में नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Federal Democratic Republic) घोषित किया गया।
बोलीविया (Bolivia) के शहर कोचाबम्बा (Cochabamba) में 2000 में जल आपूर्ति का निजीकरण (Privatization) किया गया। सरकार ने जल आपूर्ति का ठेका एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी बेक्टेल (Bechtel) को दे दिया। इसके बाद पानी की कीमतें चार गुना बढ़ गईं, जो गरीब लोगों की पहुँच से बाहर हो गईं।
इसके विरोध में FEDECOR (Federation of Irrigators) ने श्रमिक संघों, मानवाधिकार संगठनों और आम नागरिकों के साथ मिलकर एक शक्तिशाली आन्दोलन खड़ा किया। जनवरी 2000 में शहर बंद रहा, अप्रैल में सरकार ने मार्शल लॉ लगाया, लेकिन जनता ने हार नहीं मानी। अंततः सरकार को बेक्टेल कम्पनी से अनुबंध रद्द करना पड़ा और जल आपूर्ति पुनः नगरपालिका को सौंपी गई।
नेपाल और बोलीविया के उदाहरण दिखाते हैं कि लोकतंत्र केवल संविधान और चुनावों से नहीं चलता। जनता की सक्रिय भागीदारी और संघर्ष ही लोकतंत्र को जीवित और गतिशील बनाते हैं। जब सरकारें जनहित की अनदेखी करती हैं, तो जन-आन्दोलन लोकतंत्र की रक्षा करते हैं।
लोकतांत्रिक संघर्ष दो प्रकार के हो सकते हैं — पहला, लोकतंत्र की स्थापना के लिए (जैसे नेपाल में राजतंत्र के विरुद्ध) और दूसरा, मौजूदा लोकतंत्र को बेहतर बनाने के लिए (जैसे बोलीविया में निजीकरण के विरुद्ध)। दोनों ही प्रकार के संघर्ष लोकतंत्र को गहरा (Deepening) बनाते हैं और जनता की शक्ति को प्रदर्शित करते हैं।
लोकतंत्र में दबाव समूह (Pressure Groups) और आन्दोलन (Movements) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दबाव समूह ऐसे संगठन हैं जो सरकार की नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन सत्ता में आने की इच्छा नहीं रखते। ये दो प्रकार के होते हैं:
दबाव समूह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाते हैं — लॉबिंग (Lobbying) यानी सरकारी अधिकारियों से सीधी बातचीत, प्रदर्शन और रैलियाँ, हड़ताल (Strikes), मीडिया अभियान, और जनजागरूकता कार्यक्रम। ये समूह लोकतंत्र में विविध आवाजों को सुनिश्चित करते हैं और सरकार पर जवाबदेही का दबाव बनाते हैं।
कारण: 2005 में राजा ज्ञानेन्द्र ने संसद भंग करके सारी शक्तियाँ अपने हाथ में ले लीं। प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाई और नेताओं को गिरफ्तार किया। यह एक शाही तख्तापलट था।
परिणाम: SPA और माओवादियों के नेतृत्व में व्यापक जन-आन्दोलन हुआ। राजा को झुकना पड़ा — संसद बहाल हुई, SPA सरकार बनी, राजा की शक्तियाँ समाप्त हुईं और बाद में नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना।
बोलीविया के कोचाबम्बा शहर में सरकार ने जल आपूर्ति का निजीकरण कर बहुराष्ट्रीय कम्पनी बेक्टेल को ठेका दिया। इससे पानी की कीमतें चार गुना बढ़ गईं।
FEDECOR, श्रमिक संघों और नागरिकों ने मिलकर आन्दोलन किया। मार्शल लॉ के बावजूद जनता नहीं रुकी। अंततः सरकार ने बेक्टेल से अनुबंध रद्द किया और जल आपूर्ति नगरपालिका को लौटाई। यह जनशक्ति की जीत थी।
दबाव समूह ऐसे संगठन हैं जो सरकार की नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन सत्ता में आने की इच्छा नहीं रखते।
दो प्रकार:
जन-संघर्ष लोकतंत्र को कई तरीकों से मजबूत बनाते हैं:
दबाव समूह निम्नलिखित तरीके अपनाते हैं:
दबाव समूह सरकार की नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं लेकिन सत्ता में आने की इच्छा नहीं रखते, जबकि राजनीतिक दल चुनाव लड़कर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। दबाव समूह विशेष मुद्दों पर केन्द्रित होते हैं, जबकि दल व्यापक नीतियाँ बनाते हैं।
FEDECOR (Federation of Irrigators) बोलीविया का सिंचाई किसानों का संघ है। जब कोचाबम्बा में जल निजीकरण से पानी की कीमतें चार गुना बढ़ गईं, तो FEDECOR ने श्रमिक संघों और नागरिकों को संगठित करके जल युद्ध का नेतृत्व किया, जिससे सरकार को बेक्टेल का अनुबंध रद्द करना पड़ा।
वर्ग-विशेष हित समूह अपने सदस्यों के विशेष हितों (जैसे वेतन, व्यापारिक नीतियाँ) की रक्षा करते हैं — उदाहरण: श्रमिक संघ, FICCI। जनहित समूह पूरे समाज या वंचित वर्गों के हित में काम करते हैं — उदाहरण: नर्मदा बचाओ आन्दोलन, BAMCEF। जनहित समूहों का उद्देश्य सामूहिक कल्याण है।
नेपाल का जन-आन्दोलन (2006): यह लोकतंत्र की स्थापना के लिए था। राजा ज्ञानेन्द्र ने तख्तापलट कर संसद भंग की थी। SPA और माओवादियों ने मिलकर आन्दोलन किया। परिणामस्वरूप संसद बहाल हुई, राजा की शक्तियाँ छीनी गईं और नेपाल गणराज्य बना।
बोलीविया का जल युद्ध (2000): यह मौजूदा लोकतंत्र में नीतिगत बदलाव के लिए था। जल निजीकरण से पानी महँगा हुआ। FEDECOR और श्रमिक संघों ने आन्दोलन किया। सरकार को MNC बेक्टेल का अनुबंध रद्द करना पड़ा।
सबक: (1) लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, जन-संघर्षों से भी मजबूत होता है। (2) संगठित जनशक्ति शासन को बदल सकती है। (3) दबाव समूह और आन्दोलन लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (4) लोकतंत्र एक सतत प्रक्रिया है जिसमें जनता की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।