माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान
नमूना प्रश्न-पत्र (Model Paper) 2026
विषयः – हिन्दी (कक्षा – 10वीं)
1. उद्देश्य हेतु अंकभार (Weightage by Objective)
| क्र.स. | उद्देश्य | अंकभार | प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| 1. | ज्ञान | 17 | 21.25 |
| 2. | अवबोध | 32 | 40.00 |
| 3. | ज्ञानोपयोग | 13 | 16.25 |
| 4. | कौशल | 13 | 16.25 |
| 5. | विश्लेषण | 5 | 6.25 |
| योग | 80 | 100 |
2. प्रश्नों के प्रकार अनुसार अंकभार (Weightage by Question Type)
| क्र.स. | प्रश्नों का प्रकार | प्रश्नों की संख्या | अंक प्रतिप्रश्न | कुल अंक | प्रतिशत (अंको का) | प्रतिशत (प्रश्नों का) | संभावित समय |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1. | बहुविकल्पात्मक | 18 | 1 | 18 | 22.5 | 34.61 | 25 |
| 2. | रिक्तस्थान | 06 | 1 | 06 | 7.5 | 11.54 | 10 |
| 3. | अतिलघुत्तरात्मक | 12 | 1 | 12 | 15.0 | 23.08 | 40 |
| 4. | लघुत्तरात्मक | 09 | 2 | 18 | 22.5 | 17.31 | 45 |
| 5. | दीर्घउत्तरीय | 04 | 3 | 12 | 15.0 | 7.69 | 40 |
| 6. | निबंधात्मक | 03 | 1×6=6 2×4=8 | 14 | 17.5 | 5.77 | 35 |
| योग | 52 | 80 | 100 | 100 | 195 मिनट |
3. विषय वस्तु का अंकभार (Content Weightage)
| विषय वस्तु (Content Area) | अंक | प्रश्नों का विवरण (Questions Detail) |
|---|---|---|
| 1. क्षितिज (गद्य) | 18 | 5 MCQ 2 अतिलघु 2 लघु 1 दीर्घ |
| 2. क्षितिज (पद्य) | 15 | 5 MCQ 2 अतिलघु 2 लघु 1 दीर्घ |
| 3. कृतिका | 11 | 2 MCQ 3 लघु 1 दीर्घ |
| 4. व्यावहारिक व्याकरण | 10 | 6 रिक्त 2 लघु |
| 5. रचना-पत्र | 4 | 1 निबंध (पत्र) |
| 6. निबन्ध | 6 | 1 निबंध (लेख) |
| 7. संक्षिप्तीकरण एवं पल्लवन | 4 | 1 निबंध (संक्षेप) |
| 8. अपठित गद्यांश | 6 | 6 MCQ |
| 9. अपठित पद्यांश | 6 | 6 अतिलघु |
| कुल योग | 80 | 52 प्रश्न |
नियम: जब ‘इक’ प्रत्यय लगता है, तो शब्द के पहले स्वर में वृद्धि (Adivriddhi) होती है। ‘भूगोल’ (उ) + इक = ‘भौगोलिक’ (औ)। इसी प्रकार: समाज + इक = सामाजिक।
व्याख्या: निर् (उपसर्ग) + आकार (मूल शब्द) = निराकार। ‘र्’ में ‘आ’ जुड़ने से ‘रा’ बनता है। इसका अर्थ है ‘जिसका कोई आकार न हो’।
कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं:
1. सकर्मक क्रिया (Transitive Verb): जब क्रिया का फल (प्रभाव) कर्ता को छोड़कर ‘कर्म’ पर पड़ता है।
पहचान: क्रिया के साथ ‘क्या’, ‘किसे’ या ‘किसको’ लगाकर प्रश्न करने पर उत्तर मिलता है।
उदाहरण: ‘राम आम खाता है।’ (यहाँ ‘खाने’ का फल ‘आम’ पर पड़ रहा है)।
2. अकर्मक क्रिया (Intransitive Verb): जब क्रिया का फल सीधा ‘कर्ता’ पर पड़ता है और कर्म की आवश्यकता नहीं होती।
उदाहरण: ‘पक्षी उड़ते हैं।’ (‘उड़ने’ का फल सीधा ‘पक्षी’ पर है)।
विशेषण के 4 प्रमुख भेद हैं:
1. गुणवाचक: गुण, दोष, रंग, आकार आदि (उदा० काला, सुंदर, लंबा, ईमानदार)।
2. संख्यावाचक: संख्या का बोध (उदा० चार, कुछ, पहला)।
3. परिमाणवाचक: माप-तौल का बोध (उदा० दो लीटर, थोड़ा दूध)।
4. सार्वनामिक (संकेतवाचक): जब सर्वनाम संज्ञा से पहले आकर विशेषण का काम करे (उदा० वह लड़का)।
इसके 4 मुख्य भेद हैं:
1. क्रिया-विशेषण: क्रिया की विशेषता (उदा० धीरे-धीरे, आज, कल)।
2. संबंधबोधक: संज्ञा/सर्वनाम के बाद आकर संबंध बताना (उदा० के पास, के ऊपर)।
3. समुच्चयबोधक: दो वाक्यों/शब्दों को जोड़ना (उदा० और, किंतु, इसलिए)।
4. विस्मयादिबोधक: भाव (हर्ष, शोक) प्रकट करना (उदा० अरे!, वाह!)।
सर्वनाम के 6 भेद:
1. पुरुषवाचक: (मैं, तुम, वह) – वक्ता, श्रोता या अन्य के लिए।
2. निश्चयवाचक: (यह, वह) – निश्चित वस्तु का बोध।
3. अनिश्चयवाचक: (कोई, कुछ) – अनिश्चितता का बोध।
4. संबंधवाचक: (जो-सो, जिसकी-उसकी) – संबंध बताना।
5. प्रश्नवाचक: (कौन, क्या) – प्रश्न पूछने के लिए।
6. निजवाचक: (स्वयं, खुद, अपने-आप) – कर्ता के अपनेपन के लिए।
मुख्य भेद: स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि।
स्वर संधि के 5 भेद हैं:
1. दीर्घ: (अ+अ=आ)
2. गुण: (अ+इ=ए, अ+उ=ओ)
3. वृद्धि: (अ+ए=ऐ, अ+ओ=औ)
4. यण: (इ+अ=य, उ+अ=व) → उदाहरण: सु + आगत = स्वागत (उ का व)।
5. अयादि: (ए+अ=अय, ओ+अ=अव)।
प्रमुख भेद:
1. अव्ययीभाव: प्रथम पद प्रधान/अव्यय (यथाशक्ति)।
2. तत्पुरुष: दूसरा पद प्रधान, कारक चिह्नों का लोप (राजपुत्र)।
3. कर्मधारय: विशेषण-विशेष्य संबंध (नीलकमल)।
4. द्विगु: प्रथम पद संख्यावाचक (चौराहा)।
5. द्वन्द्व: दोनों पद प्रधान, बीच में ‘और’ (माता-पिता, रात-दिन)।
6. बहुव्रीहि: अन्य पद प्रधान (दशानन = रावण)।
(i) भारत के राष्ट्रीय आदर्श है? उत्तर: (ब) त्याग और सेवा
(ii) दूसरों के लिए सोचने से हदय में किस प्रकार का बल आ जाता है? उत्तर: (स) सिंह-सा (शेर जैसा साहस)
(iii) ‘स्वार्थी’ शब्द का विपरीतार्थक शब्द गद्यांश में से छाँटकर बताइए। उत्तर: (स) निःस्वार्थ
(iv) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। उत्तर: भारत के राष्ट्रीय आदर्श / त्याग और सेवा का महत्त्व
(v) लेखक को क्या देखकर प्रसन्नता होगी? उत्तर: यदि लोग दूसरों के लिए परिश्रम करते-करते अपना बलिदान भी दे दें।
(vi) कौनसा व्यक्ति उत्तम रूप से कार्य करता है? उत्तर: जो पूर्णतया निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है।
उषा की लाली में अभी से गए निखर
हिमगिरि के कनक-शिखर
आगे बढ़ा शिशु-रवि
बदली छवि, बदली छवि
देखता रह गया अपलक कवि
डर था प्रतिपल अपरूप यह जादुई आभा
जाए न बिखर, जाए न बिखर
(i) पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए? उत्तर: उषा की लाली / प्राकृतिक सुषमा
(ii) पद्यांश में किस समय का वर्णन हुआ है? उत्तर: सूर्योदय (उषा काल) का।
(iii) कवि को क्या डर लग रहा था? उत्तर: कि यह जादुई आभा (सुंदरता) कहीं बिखर कर नष्ट न हो जाए।
(iv) कविता में कवि ने हिमगिरी किसे कहा है? उत्तर: (अ) हिमालय
(v) हिमगिरी के शिखर किससे निखर गए है? उत्तर: (स) उषा की लाली से
(vi) कविता में रवि को किस के समान बताया है? उत्तर: (द) शिशु (बाल सूर्य)
(i) आसाढ़ मास में प्राकृतिक वातावरण कैसा होता है? उत्तर: आसमान बादलों से घिरा होता है, धूप नहीं होती और ठंडी पुरवाई चलती है।
(ii) आसाढ़ की रिमझिम में गाँव के लोग क्या करते हैं? उत्तर: लोग खेतों में हल चलाते हैं और धान की रोपनी करते हैं।
(iii) किसके संगीत के स्वर की तरंग स्वर्ग की ओर एवं लोगों के कानों की ओर आ रही है? उत्तर: बालगोबिन भगत के संगीत की।
(i) स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं की क्या भूमिका थी? उत्तर: युवा पूरे जोश-खरोश के साथ प्रभात फेरियों, हड़तालों और जुलूसों में भाग लेते थे।
(ii) शीला अग्रवाल की जोशीली बातो का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा? उत्तर: लेखिका की रगों में बहता खून लावे में बदल गया (क्रांतिकारी विचार प्रबल हो गए)।
(iii) लेखिका ने स्वत्रतंत्रता संग्राम में कैसे सहभागिता निभाई? उत्तर: नारे लगाकर, हड़तालें करवाकर और जुलूसों में भाग लेकर।
फसल क्या है ?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपान्तर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का !
(i) काव्यांश में किन मानवीय मूल्यों की ओर संकेत किया गया है? उत्तर: इसमें मानव श्रम (किसानों की मेहनत) और प्रकृति के सहयोग के महत्त्व की ओर संकेत किया गया है।
(ii) खेतों में लहलहाती हुई फसल को देखकर मानव मन से क्या चित्र उभरता है? उत्तर: यह चित्र उभरता है कि फसल केवल पौधा नहीं, बल्कि नदियों, मिट्टी, धूप, हवा और मानव श्रम का सम्मिलित रूप है।
(iii) ‘रूपान्तर है सूरज की किरणों का’ पंक्ति का आशय लिखिए? उत्तर: इसका आशय है कि फसल सूरज की ऊर्जा (प्रकाश संश्लेषण) को अपने अंदर ग्रहण करके ही बढ़ती है और अन्न का रूप लेती है।
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम वचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसो, ज्यौं करूई ककरी।
सू तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सुर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।
(i) गोपियों ने कृष्ण की तुलना किससे और क्यों की है? उत्तर: हारिल पक्षी की लकड़ी से। जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने मन-वचन-कर्म से कृष्ण को पकड़ रखा है।
(ii) गोपियों का उद्धव द्वारा दिया गया योग संदेश कैसा प्रतीत होता है? उत्तर: कड़वी ककड़ी (करूई ककरी) के समान अरुचिकर और व्यर्थ।
(iii) काव्यांश में रेखांकित पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। उत्तर: गोपियाँ कहती हैं कि योग साधना तो उन लोगों को सौंपनी चाहिए जिनका मन ‘चकरी’ की तरह चंचल है। हमारा मन तो कृष्ण में स्थिर है।
वाक्य प्रयोग: हमारे मोहल्ले में जब भी कोई उत्सव होता है, तो वर्मा जी उसमें शामिल नहीं होते, वे तो हमेशा अपनी खिचड़ी अलग पकाते हैं।
वाक्य प्रयोग: पूरे गाँव में कोई भी अंग्रेजी नहीं जानता था, लेकिन सुरेश थोड़ी-बहुत अंग्रेजी बोल लेता था, इसलिए वह गाँव वालों के लिए अंधों में काना राजा बना हुआ है।
1. देशभक्ति का उपहास: जब हालदार साहब ने चश्मे वाले के बारे में पूछा कि क्या वह कोई ‘कैप्टन’ (फौजी) था, तो पानवाले ने व्यंग्य से यह जवाब दिया। वह कैप्टन की सच्ची देशभक्ति और नेताजी के प्रति सम्मान को समझने के बजाय, उसे ‘पागलपन’ मानता था।
2. शारीरिक अक्षमता पर कटाक्ष: ‘लंगड़ा’ शब्द का प्रयोग अत्यंत अपमानजनक था। यह दर्शाता है कि पानवाला केवल शारीरिक बल को महत्व देता है, मन की शक्ति और त्याग को नहीं। उसके लिए एक विकलांग व्यक्ति का देश के लिए कुछ करना हंसी का पात्र था।
3. उदासीन नागरिकता: पानवाला स्वयं स्वस्थ था लेकिन देश के लिए कुछ नहीं करता था। वह उन लोगों का प्रतिनिधि है जो अपनी कमियों को छिपाने के लिए देशभक्तों का मजाक उड़ाते हैं। यह दृष्टिकोण अत्यंत निंदनीय और नकारात्मक है।
जिस बुद्धि और योग्यता (आविष्कार शक्ति) से मनुष्य का हित होता है, जैसे सुई-धागे का आविष्कार (तन ढकने के लिए) या आग का आविष्कार (पेट भरने के लिए), वह ‘संस्कृति’ है।
किंतु, यदि मानव अपनी बुद्धि का प्रयोग आत्म-विनाश के साधनों (जैसे परमाणु बम, घातक हथियार) के निर्माण में करता है, जिससे मानवता का अहित होता है, तो लेखक उसे संस्कृति नहीं, बल्कि ‘असंस्कृति’ (Un-culture) कहते हैं। असंस्कृति हमेशा विध्वंसक होती है और यदि इसे रोका नहीं गया, तो यह पूरी सभ्यता के पतन का कारण बन सकती है। इसलिए मानव कल्याण के विपरीत किया गया कोई भी आविष्कार असंस्कृति है।
1. प्राकृतिक सुषमा: चारों ओर हरियाली है। पेड़ों की डालियाँ कहीं लाल (कोमल) तो कहीं हरे पत्तों से लद गई हैं। फूलों की बहार से पूरा वातावरण रंगीन हो गया है।
2. सुगंधित वातावरण: फूलों की भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुल गई है, जिससे ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं ‘सांस’ ले रही हो। यह सुगंध घर-घर में भर गई है।
3. मन की उड़ान: प्रकृति का यह रूप इतना आकर्षक है कि मन पक्षी की तरह आकाश में पंख फैलाकर उड़ने को आतुर हो जाता है।
4. सम्मोहन: सुंदरता इतनी व्यापक है कि कवि चाहकर भी अपनी आँखें उससे हटा नहीं पा रहा है। धरती का कोना-कोना इस शोभा से आप्लावित है।
कविता में, संगतकार अपनी आवाज़ को जानबूझकर मुख्य गायक की आवाज़ से नीचा रखता है ताकि मुख्य गायक का प्रभाव बना रहे। यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि ‘मनुष्यता’ है। वह मुख्य गायक को बिखरने से बचाता है और उसके अकेलेपन को दूर करता है।
इसी तरह जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी – जैसे खेल में कोच और साथी खिलाड़ी, राजनीति में कार्यकर्ता, सिनेमा में तकनीशियन और मेकअप आर्टिस्ट, या युद्ध में सैनिक – ये सभी ‘संगतकार’ की भूमिका निभाते हैं। ये लोग अपनी प्रसिद्धि की परवाह किए बिना मुख्य व्यक्ति (नायक) को शिखर पर पहुँचाने में आधारस्तंभ का कार्य करते हैं। उनका योगदान अपरिहार्य है।
1. कम लेना (Minimal Consumption): ये महिलाएं अत्यंत अभावों में जीती हैं। कड़कड़ाती ठंड में भी वे साधारण कपड़े पहनती हैं और बहुत कम सुविधाओं का उपभोग करती हैं। बदले में उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है, जिससे उनका जीवनयापन मुश्किल से होता है।
2. अधिक लौटाना (Maximum Contribution): इसके विपरीत, इनका योगदान समाज और देश के लिए अमूल्य है। वे अपनी पीठ पर बच्चों को (डोको में) लादकर, जान जोखिम में डालकर पहाड़ों को काटती हैं और दुर्गम रास्ते बनाती हैं। इन्हीं रास्तों के कारण पर्यटन संभव होता है, सेना सीमा तक पहुँच पाती है और देश की अर्थव्यवस्था व सुरक्षा सुदृढ़ होती है। उनका यह मूक त्याग और श्रम-साधना समाज पर एक बड़ा ऋण है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। वे सच्चे अर्थों में समाज निर्माता हैं।
1. आंतरिक विवशता (Inner Compulsion / अनुभूति): यह सबसे प्रमुख और मौलिक कारण है। जब लेखक के मन में कोई सत्य, विचार या संवेदना इतनी तीव्र हो जाती है कि वह उसे बेचैन करने लगती है, तो उसे व्यक्त करके ही उसे शांति मिलती है। यह ‘स्वंत: सुखाय’ होता है। जैसे हिरोशिमा की घटना ने लेखक को अंदर तक झकझोर दिया, और वह कविता के रूप में फूट पड़ी।
2. बाहरी दबाव (External Pressure): कई बार लेखक बाहरी कारणों से भी लिखता है। इसमें शामिल हैं – संपादकों का आग्रह, प्रकाशकों का तकाजा, पाठकों की मांग, या सबसे व्यावहारिक कारण – आर्थिक आवश्यकता (Economic Necessity)। यद्यपि लेखक मानता है कि श्रेष्ठ साहित्य वही है जो आंतरिक अनुभूति से निकले, लेकिन कई बार बाहरी दबाव भी अनुशासन बनाने में सहायक होता है।
कृतित्व (Works):
• काव्य: ‘कामायनी’ (महाकाव्य – खड़ी बोली का गौरव ग्रंथ), ‘आँसू’ (विरह काव्य), ‘लहर’, ‘झरना’, ‘प्रेम पथिक’।
• नाटक: वे ऐतिहासिक नाटकों के सम्राट माने जाते हैं। प्रमुख नाटक: ‘चंद्रगुप्त’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘अजातशत्रु’।
• उपन्यास: ‘कंकाल’, ‘तितली’, ‘इरावती’ (अपूर्ण)।
• कहानी संग्रह: ‘आकाशदीप’, ‘आंधी’, ‘इंद्रजाल’, ‘प्रतिध्वनि’।
शैली: उनकी भाषा तत्सम प्रधान, अलंकृत और चित्रात्मक है।
कृतित्व (Works):
• उपाधि: अपनी जादुई लेखन शैली के कारण उन्हें हिंदी साहित्य में ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।
• रेखाचित्र (Sketches): ‘माटी की मूरतें’ (अमर कृति), ‘लाल तारा’।
• संस्मरण: ‘जंजीरें और दीवारें’, ‘मील के पत्थर’।
• नाटक: ‘अंबपाली’ (प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक)।
• उपन्यास: ‘पतितों के देश में’।
• यात्रा वृतांत: ‘पैरों में पंख बांधकर’।
शैली: उनकी भाषा अत्यंत सजीव, सरल और प्रवाहमयी है। वे छोटे-छोटे वाक्यों में बड़ी बात कहने और शब्दों से चित्र खींचने में माहिर थे।
विकल्प:
1) मोबाइल फोन: छात्र के लिए वरदान या अभिशाप
2) पर्यावरण संरक्षण और युवा
3) आत्मनिर्भर भारत
(1) मोबाइल फोन: छात्र के लिए वरदान या अभिशाप
(i) प्रस्तावना:
विज्ञान ने मानव जीवन को सुगम बनाने के लिए अनेक अद्भुत आविष्कार किए हैं, जिनमें ‘मोबाइल फोन’ सबसे क्रांतिकारी और प्रभावशाली है। प्रारंभ में इसका आविष्कार केवल संचार (बातचीत) के लिए हुआ था, लेकिन आज यह ‘स्मार्टफोन’ के रूप में हमारी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन चुका है। छात्रों के जीवन में इसका प्रवेश एक बड़ी बहस का विषय है कि यह उनके लिए वरदान है या अभिशाप।
(ii) मोबाइल फोन का बढ़ता प्रभाव:
21वीं सदी डिजिटल क्रांति की सदी है। विशेष रूप से कोरोना काल के बाद शिक्षा जगत में आमूलचूल परिवर्तन आया है। कल तक जो मोबाइल स्कूलों में प्रतिबंधित था, आज वह शिक्षा का मुख्य माध्यम बन गया है। आज स्कूल के होमवर्क से लेकर कॉलेज के प्रोजेक्ट्स तक, सब कुछ मोबाइल पर निर्भर है। यह छात्रों की जेब में रखा हुआ एक चलता-फिरता विश्वकोश (Encyclopedia) है।
(iii) मोबाइल फोन का लाभ (वरदान):
यदि सदुपयोग किया जाए, तो मोबाइल छात्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है:
• ज्ञान का असीमित भंडार: इंटरनेट के माध्यम से छात्र दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी पल भर में प्राप्त कर सकते हैं। ‘गूगल’ और ‘यूट्यूब’ ने सीखने की प्रक्रिया को बहुत आसान बना दिया है।
• ऑनलाइन शिक्षा: ई-लर्निंग ऐप्स, पीडीएफ नोट्स और एजुकेशनल वीडियो ने दूर-दराज के छात्रों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुलभ कराई है।
• संपर्क और सुरक्षा: मोबाइल के जरिए छात्र अपने शिक्षकों और अभिभावकों से निरंतर जुड़े रहते हैं। किसी भी आपात स्थिति में यह सुरक्षा का सबसे त्वरित साधन है।
• कौशल विकास: छात्र कोडिंग, भाषा सीखने या अन्य कौशल विकास के कोर्स घर बैठे कर सकते हैं।
(iv) मोबाइल फोन से हानि (अभिशाप):
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि इसका दुरुपयोग छात्रों के भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो रहा है:
• एकाग्रता में कमी: पढ़ाई करते समय बार-बार सोशल मीडिया (Instagram, Facebook) के नोटिफिकेशन आना छात्रों का ध्यान भटकाता है।
• समय की बर्बादी: रील देखने, चैटिंग करने और ऑनलाइन गेमिंग की लत में छात्र अपने कीमती घंटे बर्बाद कर देते हैं, जिससे उनका शैक्षणिक स्तर गिरता है।
• स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव: लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखने से आँखों की रोशनी कमजोर होना, सिरदर्द, अनिद्रा और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।
• नैतिक पतन: इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील और हिंसक सामग्री छात्रों के कोमल मन को दूषित कर रही है, जिससे वे अपराध की ओर भी उन्मुख हो सकते हैं।
(v) उपसंहार:
निष्कर्षतः, मोबाइल फोन अपने आप में केवल एक यंत्र है; वह न तो अच्छा है और न ही बुरा। उसका ‘वरदान’ या ‘अभिशाप’ होना पूरी तरह से उपयोगकर्ता के विवेक पर निर्भर करता है। यह आग की तरह है—जिससे खाना भी पकाया जा सकता है और हाथ भी जलाया जा सकता है। छात्रों को आत्म-अनुशासन के साथ इसका उपयोग केवल अपनी प्रगति के लिए करना चाहिए, न कि समय बर्बाद करने के लिए। तकनीक को हमारा गुलाम होना चाहिए, मालिक नहीं।
(2) पर्यावरण संरक्षण और युवा
(i) प्रस्तावना:
‘पर्यावरण’ शब्द ‘परि’ और ‘आवरण’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है हमारे चारों ओर का वह घेरा जो हमें जीवन प्रदान करता है। हवा, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे और जीव-जंतु मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को ‘माता’ का दर्जा दिया गया है। लेकिन वर्तमान में मनुष्य के लालच ने इस जीवनदायी पर्यावरण को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की आवश्यकता है।
(ii) पर्यावरण संरक्षण की समस्या:
आज हमारी धरती बीमार है। अनियंत्रित औद्योगीकरण, शहरीकरण और वनों की अंधाधुंध कटाई ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। नदियों का पानी जहरीला हो रहा है, हवा में सांस लेना मुश्किल है और प्लास्टिक कचरे के ढेर लग गए हैं। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (वैश्विक तापन) के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और मौसम का चक्र बदल गया है। ओजोन परत में छेद होना और नई-नई महामारियों का आना इसी पर्यावरण असंतुलन का परिणाम है।
(iii) पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व:
पर्यावरण का संरक्षण केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं मानव अस्तित्व को बचाने का प्रश्न है। यदि पर्यावरण सुरक्षित नहीं रहेगा, तो न शुद्ध हवा मिलेगी, न पीने योग्य पानी और न ही भोजन। जैव विविधता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ पृथ्वी सौंपने के लिए पर्यावरण संरक्षण अनिवार्य है।
(iv) पर्यावरण संरक्षण के उपाय (युवाओं की भूमिका):
किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा पीढ़ी होती है। पर्यावरण संरक्षण में युवा वर्ग क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है:
• व्यापक वृक्षारोपण: “एक वृक्ष, दस पुत्र समान”। युवाओं को संकल्प लेना चाहिए कि वे हर विशेष अवसर पर एक पौधा लगाएंगे और उसे बड़ा करेंगे।
• जन-जागरूकता: युवा सोशल मीडिया, नुक्कड़ नाटकों और रैलियों के माध्यम से समाज को प्रदूषण के खतरों के प्रति जागरूक कर सकते हैं।
• प्लास्टिक मुक्त भारत: ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ का पूर्ण बहिष्कार करके और कपड़े के थैलों का उपयोग बढ़ाकर युवा समाज को नई दिशा दे सकते हैं।
• जल एवं ऊर्जा संरक्षण: वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और सौर ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देने में युवा तकनीकी मदद कर सकते हैं।
• स्वच्छता अभियान: अपने आस-पास की सफाई रखकर और कचरा प्रबंधन में सहयोग देकर प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
(v) उपसंहार:
गांधीजी ने कहा था, “प्रकृति के पास हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं।” आज समय की मांग है कि युवा अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगाएं। हमें प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि पोषण करना होगा। यदि युवा आज जाग गया, तो निश्चित रूप से हम अपनी धरती को फिर से हरा-भरा और प्रदूषण मुक्त बना पाएंगे। “प्रकृति रक्षितः रक्षितः” – अर्थात जो प्रकृति की रक्षा करता है, प्रकृति उसकी रक्षा करती है।
(3) आत्मनिर्भर भारत
(i) प्रस्तावना:
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में निहित होती है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि भारत को एक सशक्त, समृद्ध और समर्थ विश्व शक्ति बनाने का महासंकल्प है। इसका उद्देश्य भारत को अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय, स्वयं अपनी क्षमताओं से निर्माण करने वाला देश बनाना है। यह अभियान भारत के स्वाभिमान और पुनरुत्थान का प्रतीक है।
(ii) आत्मनिर्भर भारत (संकल्पना):
आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग-थलग होना या वैश्वीकरण का विरोध करना नहीं है। इसका अर्थ है- भारत को इतना सक्षम बनाना कि वह विश्व कल्याण में अपनी भूमिका निभा सके। इसका मूल मंत्र है- “लोकल के लिए वोकल” (Vocal for Local)। यानी हमें न केवल स्थानीय (स्वदेशी) उत्पादों को खरीदना चाहिए, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना चाहिए ताकि वे वैश्विक ब्रांड बन सकें। हमारा लक्ष्य आयात (Import) कम करना और निर्यात (Export) बढ़ाना है।
(iii) आत्मनिर्भर भारत के पाँच स्तम्भ:
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए पाँच प्रमुख आधार स्तंभ बताए हैं:
1. अर्थव्यवस्था (Economy): ऐसी अर्थव्यवस्था जो छोटे-मोटे बदलाव नहीं, बल्कि लंबी छलांग (Quantum Jump) लगाए।
2. अवसंरचना (Infrastructure): आधुनिक बुनियादी ढांचा जो नए भारत की पहचान बने।
3. प्रणाली (System): 21वीं सदी की तकनीक पर आधारित व्यवस्था।
4. जनसांख्यिकी (Demography): दुनिया की सबसे बड़ी और जीवंत युवा शक्ति, जो हमारी ऊर्जा है।
5. मांग (Demand): हमारे पास एक विशाल बाजार और मांग की शक्ति है, जिसका पूरा दोहन जरूरी है।
(iv) आत्मनिर्भरता के उपाय एवं लाभ:
इस अभियान के तहत कृषि, रक्षा, अंतरिक्ष, चिकित्सा और तकनीक के क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। लघु और कुटीर उद्योगों (MSME) को आर्थिक पैकेज देकर मजबूत किया जा रहा है।
• लाभ: जब हम अपनी चीजें खुद बनाएंगे, तो देश का पैसा देश में रहेगा। इससे रोजगार के करोड़ों नए अवसर पैदा होंगे। गरीबी दूर होगी और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ेगा। भारत रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर होकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगा। मेक इन इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
(v) उपसंहार:
आत्मनिर्भर भारत अभियान 140 करोड़ भारतीयों के सपनों, संकल्पों और पुरुषार्थ का अभियान है। यह हमें चुनौती को अवसर में बदलना सिखाता है। 21वीं सदी भारत की सदी होगी, लेकिन इसके लिए हम सभी नागरिकों को स्वदेशी को अपनाना होगा और नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देना होगा। जब हर भारतवासी ‘स्वदेशी’ का व्रत लेगा, तभी भारत पुनः ‘विश्व गुरु’ के पद पर आसीन हो सकेगा। “सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास” से ही यह सपना साकार होगा।
(1) शैक्षणिक भ्रमण हेतु प्रार्थना पत्र
सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,
अलवर।
विषय: शैक्षणिक भ्रमण (Educational Tour) के आयोजन हेतु अनुमति बाबत।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि हम आपके विद्यालय की कक्षा 10वीं के सभी छात्र, अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज्ञान में वृद्धि हेतु राजस्थान की राजधानी जयपुर और उसके आस-पास के ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करना चाहते हैं। जैसा कि आप जानते हैं, हमारे सामाजिक विज्ञान और इतिहास के पाठ्यक्रम में आमेर का किला, जंतर-मंतर वेधशाला और हवामहल जैसे स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों का वर्णन है।
पुस्तकीय ज्ञान को जब प्रत्यक्ष अनुभव (Practical Knowledge) का साथ मिलता है, तो वह ज्ञान स्थायी और रोचक हो जाता है। “देशाटन” शिक्षा का एक अनिवार्य अंग है। इस भ्रमण से हमें न केवल ऐतिहासिक जानकारी मिलेगी, बल्कि हममें सामूहिकता, अनुशासन और नेतृत्व के गुणों का भी विकास होगा।
अतः आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि छात्रहित को ध्यान में रखते हुए, आगामी शीतकालीन अवकाश में हमारे लिए तीन दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण की अनुमति प्रदान करने और विद्यालय की ओर से एक शिक्षक के मार्गदर्शन में उचित व्यवस्था करवाने की कृपा करें। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि भ्रमण के दौरान हम पूर्ण अनुशासन बनाए रखेंगे।
दिनांक: 15 अक्टूबर 20XX
आपका आज्ञाकारी शिष्य
राकेश कुमार
(छात्र प्रतिनिधि)
कक्षा-10 ‘अ’
(2) छोटे भाई को शिक्षा का महत्त्व बताते हुए अनौपचारिक पत्र
बी-12, शास्त्री नगर,
जोधपुर।
दिनांक: 20 मार्च 20XX
प्रिय अनुज आशीष,
शुभाशीष और ढेर सारा स्नेह।
मैं यहाँ कुशल हूँ और ईश्वर से तुम्हारी कुशलता की कामना करता हूँ। कल ही पिताजी का पत्र प्राप्त हुआ, जिसे पढ़कर मन थोड़ा व्यथित हुआ। उन्होंने लिखा है कि आजकल तुम्हारा मन पढ़ाई में कम और खेल-कूद, मोबाइल तथा इधर-उधर घूमने में अधिक लग रहा है। अर्द्धवार्षिक परीक्षा में तुम्हारे कम अंक आना इसी लापरवाही का परिणाम है।
प्रिय भाई, तुम्हें अभी यह आभास नहीं है, लेकिन विद्यार्थी जीवन की नींव शिक्षा (Education) पर ही टिकी होती है। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने या नौकरी पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को एक सभ्य, संस्कारी और विचारशील नागरिक बनाती है। यह वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधेरे को मिटाकर जीवन की राह दिखाता है। याद रखना, बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। यदि तुमने यह समय मौज-मस्ती में गंवा दिया, तो भविष्य में पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा।
मेरी तुम्हें यही सलाह है कि तुम मोबाइल और टीवी का मोह त्यागकर एक निश्चित समय-सारणी (Time-table) बनाओ और नियमित अध्ययन करो। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम अपनी गलती सुधारोगे और वार्षिक परीक्षा में अच्छे अंक लाकर परिवार का नाम रोशन करोगे। घर में माता-पिता को मेरा चरण स्पर्श कहना।
तुम्हारा शुभचिंतक/बड़ा भाई
कमल
• प्रारूप (Format): 1 अंक (पता, दिनांक, संबोधन, अभिवादन, अंत)।
• विषय वस्तु (Content): 2 अंक (मुख्य बात प्रभावी ढंग से लिखी गई हो)।
• भाषा-शैली (Language): 1 अंक (शुद्धता और प्रवाह)।
नोट: अनौपचारिक पत्र (भाई/मित्र) में ‘विषय’ नहीं लिखा जाता।
मूल अवतरण का सार: पृथ्वी को ‘माता’ और स्वयं को उसका ‘पुत्र’ स्वीकार करना ही स्वराज्य की आधारशिला है। जब व्यक्ति अपनी जन्मभूमि को देवतुल्य मानकर उससे गहरा आत्मिक संबंध स्थापित कर लेता है, तो उसके हृदय में राष्ट्रप्रेम स्वतः अंकुरित हो जाता है। ऐसा व्यक्ति स्वप्न में भी देशद्रोह का विचार नहीं कर सकता। इसी पवित्र भावना से सच्ची राष्ट्रीय एकता का जन्म होता है। इस अवस्था में नागरिक व्यक्तिगत स्वार्थ, सौदेबाजी और शर्तें त्यागकर, निःस्वार्थ भाव से केवल मातृभूमि के प्रति अपने पुनीत कर्तव्यों के पालन को ही अपना धर्म मानते हैं।
शीर्षक: मातृभूमि और राष्ट्रीय एकता / सच्चा स्वराज्य
(नियम: संक्षेपण मूल शब्द का लगभग 1/3 भाग होना चाहिए और इसमें अपनी ओर से कोई नई बात नहीं जोड़नी चाहिए।)
सूक्ति: “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत”
भाव विस्तार: यह सुप्रसिद्ध उक्ति मनुष्य की मानसिक शक्ति, अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के महत्त्व को प्रतिपादित करती है। जीवन एक कुरुक्षेत्र है, जहाँ सुख-दुख, आशा-निराशा और जय-पराजय का द्वंद्व चलता रहता है। किसी भी कार्य में सफलता या असफलता का निर्णय रणभूमि में होने से पहले मनुष्य के ‘मन’ में होता है।
यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से कितना भी बलवान और साधन संपन्न क्यों न हो, यदि वह मन से हताश हो जाए और पहले ही हार मान ले, तो उसकी पराजय निश्चित है। निराश मन उसे संघर्ष करने ही नहीं देगा। इसके विपरीत, यदि मन में उत्साह, दृढ़ संकल्प और विजय का विश्वास हो, तो साधनहीन, विकलांग और कमजोर व्यक्ति भी एवरेस्ट जैसी ऊंचाइयों को छू सकता है। गांधीजी, नेपोलियन, अब्राहम लिंकन और अरुणिमा सिन्हा जैसे व्यक्तित्वों ने अपने मनोबल के दम पर ही असंभव को संभव कर दिखाया। अतः सफलता की असली कुंजी बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि हमारे अपने मन के अटूट विश्वास में छिपी है। हमें सदैव सकारात्मक सोच रखनी चाहिए, क्योंकि मनोबल ही सर्वोपरि बल है।
