Water Resources
जल एक अनिवार्य प्राकृतिक संसाधन है जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। पृथ्वी का लगभग 71% भाग जल से ढका है, लेकिन इसमें से 96.5% महासागरों में खारे जल के रूप में है। कुल मीठे जल (Fresh Water) का अनुपात मात्र 2.5% है और इसका भी एक बड़ा हिस्सा हिमनदों और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के रूप में जमा है। वास्तव में पीने और सिंचाई के लिए उपलब्ध जल 1% से भी कम है।
भारत में वार्षिक वर्षा लगभग 4,000 घन किमी होती है, लेकिन इसका केवल एक-तिहाई हिस्सा ही उपयोग हो पाता है। शेष जल बहकर समुद्र में चला जाता है या वाष्पित हो जाता है। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण जल संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है।
जल दुर्लभता (Water Scarcity) का अर्थ है जल की माँग और आपूर्ति के बीच असंतुलन। भारत के कई क्षेत्रों में जल दुर्लभता एक गंभीर समस्या बन चुकी है। राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के कुछ जिले इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित हैं।
जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जल का विवेकपूर्ण उपयोग, जल प्रदूषण पर नियंत्रण और वर्षा जल संग्रहण इसके प्रमुख उपाय हैं।
बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ (Multi-purpose River Valley Projects) वे परियोजनाएँ हैं जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं — सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, जल आपूर्ति, नौकायन और मत्स्य पालन। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाँधों को "आधुनिक भारत के मंदिर" कहा था।
बाँध निर्माण के लाभ स्पष्ट हैं — सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, जल आपूर्ति और औद्योगिक उपयोग। लेकिन बड़े बाँधों के निर्माण से अनेक सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan): सरदार सरोवर बाँध के विरोध में मेधा पाटकर के नेतृत्व में यह आंदोलन चलाया गया। इसमें विस्थापितों के पुनर्वास, पर्यावरणीय नुकसान और बड़े बाँधों की उपयोगिता पर सवाल उठाए गए। यह आंदोलन विकास बनाम पर्यावरण की बहस का प्रतीक बन गया।
वर्षा जल संग्रहण (Rainwater Harvesting) वर्षा के जल को एकत्रित करके भविष्य में उपयोग के लिए संग्रहित करने की तकनीक है। यह जल संकट का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी समाधान है। भारत में प्राचीन काल से ही जल संग्रहण की समृद्ध परंपरा रही है।
छत वर्षा जल संग्रहण (Rooftop Rainwater Harvesting) शहरी क्षेत्रों में अत्यंत प्रभावी है। इसमें छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को पाइपों के माध्यम से भूमिगत टैंकों या कुओं में एकत्रित किया जाता है। तमिलनाडु पहला राज्य है जिसने छत वर्षा जल संग्रहण को अनिवार्य किया। शिलांग (मेघालय) में भी छत वर्षा जल संग्रहण की सफल प्रणाली है।
बहुउद्देशीय परियोजनाएँ एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं:
जल दुर्लभता के प्रमुख कारण:
नर्मदा बचाओ आंदोलन सरदार सरोवर बाँध परियोजना के विरोध में शुरू हुआ। मेधा पाटकर के नेतृत्व में यह आंदोलन बड़े बाँधों की सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत पर सवाल उठाता है।
राजस्थान शुष्क जलवायु वाला क्षेत्र है जहाँ जल संकट सदियों से है। यहाँ के लोगों ने पारंपरिक जल संग्रहण की अनूठी विधियाँ विकसित कीं:
ये पारंपरिक विधियाँ आज भी प्रासंगिक हैं और आधुनिक जल संकट के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
बाँधों के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं:
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाँधों को "आधुनिक भारत के मंदिर" कहा। उनका मानना था कि जिस प्रकार प्राचीन भारत में मंदिर सभ्यता और विकास के प्रतीक थे, उसी प्रकार स्वतंत्र भारत में बाँध और बहुउद्देशीय परियोजनाएँ आर्थिक विकास, सिंचाई, विद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण का आधार बनेंगी।
छत वर्षा जल संग्रहण में भवनों की छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को पाइपों और फिल्टर के माध्यम से भूमिगत टैंकों या पुनर्भरण कुओं में एकत्रित किया जाता है। इससे भूजल स्तर बढ़ता है और जल संकट कम होता है। तमिलनाडु पहला राज्य है जिसने सभी भवनों में यह प्रणाली अनिवार्य की।
बहुउद्देशीय परियोजना वह नदी घाटी परियोजना है जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करती है — सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, पेयजल आपूर्ति, अंतर्देशीय नौकायन और मत्स्य पालन। उदाहरण — भाखड़ा नांगल (सतलुज), हीराकुड (महानदी), दामोदर घाटी (दामोदर)।
जल संकट के कारण:
समाधान: