Nationalism in India
भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism) का विकास औपनिवेशिक शासन (Colonial Rule) के विरुद्ध एक लंबे संघर्ष की प्रक्रिया था। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के बाद भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात हुआ जिसमें महात्मा गांधी ने जन आंदोलनों के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई दिशा दी।
इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement), सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) और अन्य जन आंदोलनों ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट किया और राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।
प्रथम विश्व युद्ध (World War I, 1914-18) ने भारतीय राजनीति में गहरा परिवर्तन लाया। युद्ध के कारण रक्षा व्यय में भारी वृद्धि हुई, करों में बढ़ोतरी की गई और सैनिकों की जबरन भर्ती की गई। 1918-19 में फसल खराब होने और इन्फ्लुएंजा महामारी ने स्थिति और गंभीर बना दी।
रॉलेट एक्ट (1919) के विरोध में गांधीजी ने देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलवाईं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।
असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) में समाज के विभिन्न वर्गों ने अपने-अपने तरीके से भाग लिया, लेकिन प्रत्येक वर्ग ने स्वराज (Swaraj) को अपने अनुसार परिभाषित किया।
फरवरी 1922 में चौरी-चौरा कांड (Chauri Chaura Incident) में भीड़ ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गांधीजी ने हिंसा के कारण असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने — चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने 1923 में स्वराज पार्टी (Swaraj Party) बनाई।
1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की माँग की गई। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। इसके बाद गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की शुरुआत की।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने भाग लिया। समृद्ध किसानों (Patidars) ने राजस्व देने से इनकार किया। गरीब किसानों ने लगान माफी की माँग की। व्यापारी वर्ग ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। महिलाओं ने बड़ी संख्या में नमक बनाने, शराब की दुकानों पर धरना देने और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग में भाग लिया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ थीं। समाज के सभी वर्ग इसमें समान रूप से शामिल नहीं हुए।
इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर विभिन्न तनाव विद्यमान थे जिन्हें पूरी तरह सुलझाया नहीं जा सका।
राष्ट्रवाद के विकास में सामूहिक अपनेपन का भाव (Sense of Collective Belonging) अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह भावना विभिन्न माध्यमों — संस्कृति, इतिहास, प्रतीकों और चिह्नों — के द्वारा विकसित की गई।
हालांकि, सामूहिक पहचान बनाने की इस प्रक्रिया में कभी-कभी कुछ समुदायों की उपेक्षा भी हुई। विभिन्न समूहों ने राष्ट्र की अलग-अलग कल्पना की, जिससे तनाव भी पैदा हुए। फिर भी, स्वतंत्रता संग्राम ने एक साझी राष्ट्रीय पहचान का निर्माण किया जो आज भी भारतीय लोकतंत्र की नींव है।
भारत में असहयोग आंदोलन निम्नलिखित कारणों से शुरू हुआ:
सविनय अवज्ञा आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी इस प्रकार थी:
फरवरी 1922 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसके प्रमुख कारण थे:
कई कांग्रेसी नेता इस निर्णय से असहमत थे। चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने 1923 में स्वराज पार्टी बनाकर विधायी राजनीति में भाग लेने का निर्णय लिया।
नमक यात्रा (दांडी मार्च): 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 विश्वसनीय स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) से दांडी (गुजरात तट) तक लगभग 240 मील (385 किमी) की पदयात्रा शुरू की। 24 दिन चलकर 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा।
यह प्रभावी प्रतीक क्यों था:
सत्याग्रह (Satyagraha) शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — 'सत्य' (Truth) और 'आग्रह' (Insistence/Firmness)। इसका अर्थ है — सत्य का आग्रह या सत्य के लिए दृढ़ संकल्प।
गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह की प्रमुख विशेषताएँ:
खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा (Caliph) के समर्थन में शुरू किया गया था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने तुर्की (Ottoman Empire) को विभाजित कर दिया और खलीफा की शक्ति छीन ली। भारतीय मुसलमान इससे नाराज थे। मुहम्मद अली और शौकत अली ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। गांधीजी ने खिलाफत और असहयोग को एक साथ जोड़कर हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित की और एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया।
पूना पैक्ट (1932) गांधीजी और डॉ. अम्बेडकर के बीच हुआ एक समझौता था। ब्रिटिश सरकार ने कम्युनल अवॉर्ड (Communal Award) के तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorate) दिए थे। गांधीजी ने इसे राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा मानकर आमरण अनशन शुरू किया। अंततः समझौते में अलग निर्वाचन क्षेत्रों की जगह आरक्षित सीटें (Reserved Seats) प्रदान की गईं।
अल्लूरी सीताराम राजू आंध्र प्रदेश के गूडेम पहाड़ियों में आदिवासी विद्रोह के नेता थे। उन्होंने 1920 के दशक में औपनिवेशिक वन नीतियों (Colonial Forest Laws) के विरुद्ध सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध किया। ये वन कानून आदिवासियों को जंगल में स्वतंत्र रूप से रहने और पशुचारण से रोकते थे। राजू ने गांधीजी को अपना प्रेरणास्रोत माना और खादी पहनने तथा शराब त्यागने का समर्थन किया, लेकिन उनका तरीका सशस्त्र संघर्ष था। 1924 में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर फाँसी दे दी।
कारण: 1929 में विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (Great Depression) ने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। कृषि उत्पादों की कीमतें गिरीं, किसान कर्ज में डूबे। कांग्रेस ने दिसम्बर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज (Complete Independence) का प्रस्ताव पारित किया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
स्वरूप: गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को दांडी मार्च शुरू किया और 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ा। इसके बाद पूरे देश में आंदोलन फैल गया — लोगों ने नमक बनाया, विदेशी कपड़ों की होली जलाई, शराब की दुकानों पर धरना दिया, सरकारी करों का भुगतान बंद किया। पेशावर में खान अब्दुल गफ्फार खान (Frontier Gandhi) ने पठानों को संगठित किया।
सीमाएँ: (1) दलित समुदाय — डॉ. अम्बेडकर ने कांग्रेस पर सवर्ण वर्चस्व का आरोप लगाया और दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग की। (2) मुस्लिम समुदाय — बड़ी संख्या में मुसलमान इस आंदोलन से दूर रहे क्योंकि उन्हें लगता था कि हिंदू बहुसंख्यक सरकार में उनके हितों की उपेक्षा होगी। (3) गरीब किसान — लगान माफी की उनकी माँग को कांग्रेस ने पूरी तरह समर्थन नहीं दिया। (4) औद्योगिक मजदूर — उनकी भागीदारी सीमित रही।
1931 में गांधी-इरविन समझौते के बाद आंदोलन रोका गया, लेकिन दूसरे गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद यह 1934 तक चलता रहा।