The Making of a Global World
भूमंडलीकरण (Globalisation) का अर्थ है विश्व के विभिन्न भागों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संपर्कों का विस्तार। यह कोई आधुनिक घटना नहीं है — सदियों पहले से व्यापार, प्रवास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से विश्व के विभिन्न हिस्से जुड़ते रहे हैं।
इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे प्राचीन रेशम मार्गों (Silk Routes) से लेकर आधुनिक ब्रेटन वुड्स संस्थानों (Bretton Woods Institutions) तक विश्व अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ और भारत इस प्रक्रिया से कैसे प्रभावित हुआ।
रेशम मार्ग (Silk Routes) प्राचीन काल से एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों का जाल था। इन मार्गों का नाम चीन से पश्चिम की ओर ले जाए जाने वाले रेशम (Silk) के नाम पर पड़ा।
रेशम मार्गों से केवल व्यापारिक वस्तुएँ ही नहीं बल्कि विचार, आविष्कार, धर्म और बीमारियाँ भी फैलीं। भारत से कपड़े और मसाले, चीन से रेशम और बारूद, अरब से ज्ञान और गणित — ये सब रेशम मार्गों से दुनिया भर में पहुँचे।
19वीं सदी में औपनिवेशिक विस्तार (Colonial Expansion) और औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ने विश्व अर्थव्यवस्था को मूलभूत रूप से बदल दिया। ब्रिटेन जैसी औद्योगिक शक्तियों ने अपने उपनिवेशों से कच्चा माल लिया और तैयार माल बेचा।
गिरमिटिया मजदूर (Indentured Labourers) — 19वीं सदी में भारत के गरीब क्षेत्रों — पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत — से लाखों मजदूरों को अनुबंध (Contract) पर विदेशी बागानों में काम करने भेजा गया। ये मजदूर कैरेबियन द्वीपों (त्रिनिडाड, गुयाना), मॉरीशस, फिजी और सीलोन (श्रीलंका) गए। इन्हें अक्सर धोखा दिया जाता था और इनकी स्थिति नव-दासता (New System of Slavery) जैसी थी।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने विश्व अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया। युद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हुआ और अमेरिका (USA) विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनकर उभरा। युद्ध से पहले अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय ऋणदाता नहीं था, लेकिन युद्ध के बाद वह दुनिया का सबसे बड़ा लेनदार (Creditor) बन गया।
1929 में अमेरिका से शुरू हुई महामंदी (Great Depression) आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक त्रासदी थी। यह 1929 से लगभग 1930 के दशक के मध्य तक चली और इसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया।
भारत पर महामंदी का प्रभाव: भारतीय कृषि उत्पादों — विशेषकर जूट, कपास और गेहूँ — की कीमतें 50% से अधिक गिर गईं। किसानों की आय घटी लेकिन सरकारी लगान (Revenue) कम नहीं हुआ। शहरी क्षेत्रों में भी बेरोजगारी बढ़ी। इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को और तेज किया क्योंकि लोगों ने ब्रिटिश शासन को अपनी आर्थिक समस्याओं का कारण माना।
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods, New Hampshire) में एक सम्मेलन हुआ। इसमें दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की गई।
1950-60 के दशक में विश्व व्यापार और आय में तेजी से वृद्धि हुई। लेकिन अधिकांश विकासशील देशों को इसका लाभ नहीं मिला। 1970 के दशक में कई विकासशील देशों ने मिलकर G-77 (Group of 77) बनाया और नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO — New International Economic Order) की माँग की जिसमें उन्हें अपने संसाधनों पर अधिक नियंत्रण, विकास सहायता और कच्चे माल का उचित मूल्य मिले।
रेशम मार्ग प्राचीन काल से एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों का जाल था:
इस प्रकार रेशम मार्ग केवल व्यापार के माध्यम नहीं थे बल्कि ये सभ्यताओं के बीच सेतु का काम करते थे।
गिरमिटिया मजदूर 19वीं सदी में भारत से अनुबंध (Contract/Agreement) पर विदेशी बागानों और खदानों में काम करने के लिए भेजे गए मजदूर थे:
महामंदी के कारण:
भारत पर प्रभाव:
जुलाई 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स (New Hampshire) में मित्र राष्ट्रों का सम्मेलन हुआ। इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना था:
19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका पर कब्जा किया जिसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा:
अर्थशास्त्रियों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन प्रवाह होते हैं: (1) व्यापार का प्रवाह (Trade Flow) — वस्तुओं का एक देश से दूसरे देश में व्यापार, (2) श्रम का प्रवाह (Labour Flow) — लोगों का रोजगार की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास, और (3) पूँजी का प्रवाह (Capital Flow) — अल्पकालिक और दीर्घकालिक निवेश तथा ऋण के रूप में धन का एक देश से दूसरे देश में प्रवाह। ये तीनों प्रवाह मिलकर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के गंभीर आर्थिक प्रभाव पड़े: (1) लगभग 90 लाख सैनिक और 2 करोड़ नागरिक मारे गए जिससे कार्यशील जनसंख्या घटी, (2) यूरोपीय देशों पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ा — ब्रिटेन विश्व का सबसे बड़ा ऋणदाता से ऋणी बन गया, (3) अमेरिका विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनकर उभरा, (4) औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के बाद युद्धोपरांत माँग घटने से बेरोजगारी बढ़ी, और (5) कृषि क्षेत्र में अति-उत्पादन की समस्या पैदा हुई।
IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष): इसका मुख्य कार्य सदस्य देशों की मुद्रा विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखना और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के संकट में अल्पकालिक ऋण देना है। विश्व बैंक (IBRD): इसका मुख्य कार्य युद्ध से तबाह देशों का पुनर्निर्माण और विकासशील देशों को दीर्घकालिक विकास ऋण देना है। दोनों संस्थाओं की स्थापना 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में हुई और दोनों पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभुत्व रहा है।
19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति, औपनिवेशिक विस्तार और तकनीकी प्रगति ने विश्व अर्थव्यवस्था को मूलभूत रूप से बदल दिया:
व्यापार का प्रवाह: 1846 में ब्रिटेन में कॉर्न लॉज के उन्मूलन के बाद मुक्त व्यापार का दौर शुरू हुआ। ब्रिटेन जैसे औद्योगिक देशों ने उपनिवेशों से कच्चा माल (कपास, जूट, नील) आयात किया और तैयार माल निर्यात किया। रेलवे और जहाजरानी ने व्यापार को तेज किया। भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका मुख्यतः कच्चे माल के निर्यातक बने।
श्रम का प्रवाह: यूरोप से लाखों लोग अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य नई बसी भूमियों पर गए। भारत और चीन से गिरमिटिया मजदूर कैरेबियन, मॉरीशस, फिजी और दक्षिण-पूर्व एशिया में बागानों पर काम करने गए। यह प्रवास अक्सर शोषणपूर्ण था।
पूँजी का प्रवाह: ब्रिटेन और यूरोपीय देशों ने उपनिवेशों में भारी निवेश किया — रेलवे, बंदरगाह, खदानें और बागान। लंदन विश्व का वित्तीय केंद्र बन गया। यह पूँजी प्रवाह मुख्यतः औपनिवेशिक शोषण के लिए था।
इस प्रकार 19वीं सदी में एक असमान वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ जिसमें कुछ औद्योगिक देश समृद्ध हुए जबकि उपनिवेश गरीबी और शोषण का शिकार बने।