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अध्याय 3 · इतिहास · कक्षा 10

भूमंडलीकृत विश्व का बनना

The Making of a Global World

🔍 परिचय — Introduction

भूमंडलीकरण (Globalisation) का अर्थ है विश्व के विभिन्न भागों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संपर्कों का विस्तार। यह कोई आधुनिक घटना नहीं है — सदियों पहले से व्यापार, प्रवास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से विश्व के विभिन्न हिस्से जुड़ते रहे हैं।

इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे प्राचीन रेशम मार्गों (Silk Routes) से लेकर आधुनिक ब्रेटन वुड्स संस्थानों (Bretton Woods Institutions) तक विश्व अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ और भारत इस प्रक्रिया से कैसे प्रभावित हुआ।

भूमंडलीकरण के तीन प्रवाह (Three Flows of Globalisation):

  • व्यापार का प्रवाह (Trade Flow) — वस्तुओं का एक देश से दूसरे देश में आना-जाना
  • श्रम का प्रवाह (Labour Flow) — लोगों का रोजगार के लिए प्रवास
  • पूँजी का प्रवाह (Capital Flow) — निवेश और ऋण के रूप में धन का प्रवाह

1. रेशम मार्ग — Silk Routes

रेशम मार्ग (Silk Routes) प्राचीन काल से एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों का जाल था। इन मार्गों का नाम चीन से पश्चिम की ओर ले जाए जाने वाले रेशम (Silk) के नाम पर पड़ा।

रेशम मार्गों से केवल व्यापारिक वस्तुएँ ही नहीं बल्कि विचार, आविष्कार, धर्म और बीमारियाँ भी फैलीं। भारत से कपड़े और मसाले, चीन से रेशम और बारूद, अरब से ज्ञान और गणित — ये सब रेशम मार्गों से दुनिया भर में पहुँचे।

📌 रेशम मार्गों से हुआ आदान-प्रदान:

  • व्यापारिक वस्तुएँ: रेशम, मसाले, सोना, कपड़े, बहुमूल्य धातुएँ
  • खाद्य पदार्थ: नूडल्स चीन से इटली, आलू और मिर्च अमेरिका से यूरोप/एशिया
  • धर्म और संस्कृति: बौद्ध धर्म भारत से चीन-जापान, इस्लाम अरब से दक्षिण-पूर्व एशिया
  • बीमारियाँ: 14वीं सदी में प्लेग (Black Death) रेशम मार्ग से यूरोप पहुँचा

2. उन्नीसवीं सदी — 19th Century

19वीं सदी में औपनिवेशिक विस्तार (Colonial Expansion) और औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ने विश्व अर्थव्यवस्था को मूलभूत रूप से बदल दिया। ब्रिटेन जैसी औद्योगिक शक्तियों ने अपने उपनिवेशों से कच्चा माल लिया और तैयार माल बेचा।

19वीं सदी में विश्व अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ:

  • कॉर्न लॉज (Corn Laws) का उन्मूलन (1846) — ब्रिटेन में खाद्यान्न आयात पर से प्रतिबंध हटाया
  • गिरमिटिया श्रम (Indentured Labour) — भारत, चीन से मजदूरों को कैरेबियन, फिजी, मॉरीशस भेजा गया
  • रेलवे, जहाजरानी और टेलीग्राफ ने व्यापार और संचार को तेज किया
  • भारत से कच्चा कपास, अफीम, नील (Indigo) का निर्यात बढ़ा

गिरमिटिया मजदूर (Indentured Labourers) — 19वीं सदी में भारत के गरीब क्षेत्रों — पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत — से लाखों मजदूरों को अनुबंध (Contract) पर विदेशी बागानों में काम करने भेजा गया। ये मजदूर कैरेबियन द्वीपों (त्रिनिडाड, गुयाना), मॉरीशस, फिजी और सीलोन (श्रीलंका) गए। इन्हें अक्सर धोखा दिया जाता था और इनकी स्थिति नव-दासता (New System of Slavery) जैसी थी।

3. अंतर-युद्ध काल की अर्थव्यवस्था

प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने विश्व अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया। युद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हुआ और अमेरिका (USA) विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनकर उभरा। युद्ध से पहले अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय ऋणदाता नहीं था, लेकिन युद्ध के बाद वह दुनिया का सबसे बड़ा लेनदार (Creditor) बन गया।

📌 प्रथम विश्व युद्ध का आर्थिक प्रभाव:

  • 90 लाख (9 million) सैनिक और लगभग 2 करोड़ नागरिक मारे गए
  • यूरोपीय देशों ने भारी कर्ज लिया — अमेरिका से ऋण
  • ब्रिटेन पर भारी ऋण का बोझ — अंतर्राष्ट्रीय प्रभुत्व कमजोर
  • युद्ध से लौटे सैनिकों के लिए रोजगार का संकट
  • कृषि और उद्योग दोनों क्षेत्रों में अस्थिरता

4. महामंदी — The Great Depression (1929)

1929 में अमेरिका से शुरू हुई महामंदी (Great Depression) आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक त्रासदी थी। यह 1929 से लगभग 1930 के दशक के मध्य तक चली और इसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया।

महामंदी के प्रमुख कारण:

  • अति-उत्पादन (Overproduction): कृषि और औद्योगिक उत्पादन माँग से अधिक हो गया
  • सट्टा बाजार (Stock Market Speculation): 1920 के दशक में शेयर बाजार में अनियंत्रित सट्टा
  • ऋण संकट: बैंकों ने बड़े पैमाने पर ऋण दिए जो वापस नहीं आए
  • अमेरिकी ऋण वापसी: अमेरिका ने यूरोप को दिए ऋण वापस माँगे

भारत पर महामंदी का प्रभाव: भारतीय कृषि उत्पादों — विशेषकर जूट, कपास और गेहूँ — की कीमतें 50% से अधिक गिर गईं। किसानों की आय घटी लेकिन सरकारी लगान (Revenue) कम नहीं हुआ। शहरी क्षेत्रों में भी बेरोजगारी बढ़ी। इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को और तेज किया क्योंकि लोगों ने ब्रिटिश शासन को अपनी आर्थिक समस्याओं का कारण माना।

5. विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण — Post-War Reconstruction

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods, New Hampshire) में एक सम्मेलन हुआ। इसमें दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की गई।

📌 ब्रेटन वुड्स संस्थाएँ (Bretton Woods Institutions):

  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF — International Monetary Fund): विनिमय दरों में स्थिरता और भुगतान संतुलन में सहायता
  • विश्व बैंक (World Bank / IBRD): युद्ध से तबाह देशों के पुनर्निर्माण और विकास के लिए ऋण
  • अमेरिकी डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्यता — सोने से जोड़ा गया ($35 = 1 ounce gold)
  • इन संस्थाओं पर अमेरिका का प्रभुत्व रहा — वोटिंग अधिकार आर्थिक शक्ति के अनुसार

1950-60 के दशक में विश्व व्यापार और आय में तेजी से वृद्धि हुई। लेकिन अधिकांश विकासशील देशों को इसका लाभ नहीं मिला। 1970 के दशक में कई विकासशील देशों ने मिलकर G-77 (Group of 77) बनाया और नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO — New International Economic Order) की माँग की जिसमें उन्हें अपने संसाधनों पर अधिक नियंत्रण, विकास सहायता और कच्चे माल का उचित मूल्य मिले।

⚡ त्वरित पुनरावृत्ति — Quick Revision

📌 महत्वपूर्ण तिथियाँ

  • 3000 ई.पू. — प्राचीन रेशम मार्गों का अस्तित्व
  • 14वीं सदी — प्लेग (Black Death) का प्रकोप — यूरोप की आबादी घटी
  • 1492 — कोलंबस का अमेरिका पहुँचना
  • 1846 — ब्रिटेन में कॉर्न लॉज का उन्मूलन
  • 1885 — बर्लिन सम्मेलन — अफ्रीका का विभाजन
  • 1914-18 — प्रथम विश्व युद्ध
  • 1929 — महामंदी (Great Depression) की शुरुआत
  • 1939-45 — द्वितीय विश्व युद्ध
  • 1944 — ब्रेटन वुड्स सम्मेलन — IMF और विश्व बैंक की स्थापना
  • 1947 — GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) की स्थापना

📌 महत्वपूर्ण शब्दावली

  • रेशम मार्ग (Silk Route) — एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाले प्राचीन व्यापारिक मार्ग
  • कॉर्न लॉज (Corn Laws) — ब्रिटेन में अनाज आयात पर प्रतिबंधक कानून
  • गिरमिटिया श्रम (Indentured Labour) — अनुबंध पर विदेश भेजे गए मजदूर
  • ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) — 1944 का सम्मेलन जहाँ IMF और विश्व बैंक बने
  • G-77 — विकासशील देशों का समूह जिसने NIEO की माँग की
  • NIEO — नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था
  • महामंदी (Great Depression) — 1929 से शुरू वैश्विक आर्थिक संकट
  • तीन प्रवाह (Three Flows) — व्यापार, श्रम और पूँजी का अंतर्राष्ट्रीय प्रवाह

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

  • प्लेग (Black Death) ने 14वीं सदी में यूरोप की आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा नष्ट कर दिया
  • अमेरिका की खोज के बाद सोना-चाँदी यूरोप में आया जिससे व्यापार बढ़ा
  • 19वीं सदी में लगभग 50 लाख भारतीय गिरमिटिया मजदूर विदेश गए
  • महामंदी में अमेरिका में बेरोजगारी 25% तक पहुँच गई
  • ब्रेटन वुड्स व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर को विश्व की प्रमुख आरक्षित मुद्रा बनाया गया

📌 तुलना — पूर्व-आधुनिक vs आधुनिक भूमंडलीकरण

  • गति: पूर्व-आधुनिक — धीमी (पैदल/जहाज) | आधुनिक — तेज (रेलवे/विमान)
  • माध्यम: रेशम मार्ग, समुद्री मार्ग | रेलवे, टेलीग्राफ, इंटरनेट
  • व्यापार: विलासिता की वस्तुएँ (रेशम, मसाले) | बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पाद
  • श्रम प्रवाह: व्यापारी और तीर्थयात्री | गिरमिटिया मजदूर, बड़ा प्रवास
  • नियंत्रण: कोई एक शक्ति का प्रभुत्व नहीं | औपनिवेशिक शक्तियों का नियंत्रण
  • संस्थाएँ: कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं | IMF, विश्व बैंक, WTO

📖 पाठ्यपुस्तक प्रश्न-उत्तर — NCERT Solutions

प्रश्न 1: रेशम मार्ग (Silk Routes) विश्व को कैसे जोड़ते थे? उदाहरण सहित समझाइए।

रेशम मार्ग प्राचीन काल से एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों का जाल था:

  • व्यापार: चीन से रेशम, भारत से मसाले और कपड़े, रोम से सोना-चाँदी का व्यापार होता था
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान: बौद्ध धर्म भारत से चीन और जापान तक, इस्लाम अरब से दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचा
  • खाद्य पदार्थ: नूडल्स चीन से इटली पहुँचे, अमेरिका की खोज के बाद आलू, मक्का, मिर्च एशिया और यूरोप में फैले
  • बीमारियाँ: 14वीं सदी में प्लेग (Black Death) रेशम मार्ग के जरिए यूरोप पहुँचा
  • ज्ञान और तकनीक: अरब से गणित (शून्य, अंक पद्धति), चीन से कागज और बारूद का प्रसार हुआ

इस प्रकार रेशम मार्ग केवल व्यापार के माध्यम नहीं थे बल्कि ये सभ्यताओं के बीच सेतु का काम करते थे।

प्रश्न 2: गिरमिटिया मजदूर (Indentured Labour) कौन थे? उनकी स्थिति का वर्णन करें।

गिरमिटिया मजदूर 19वीं सदी में भारत से अनुबंध (Contract/Agreement) पर विदेशी बागानों और खदानों में काम करने के लिए भेजे गए मजदूर थे:

  • ये मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के गरीब क्षेत्रों से आते थे
  • इन्हें कैरेबियन द्वीपों (त्रिनिडाड, गुयाना), मॉरीशस, फिजी, सीलोन (श्रीलंका) और मलाया भेजा गया
  • इनकी भर्ती अक्सर झूठे वादों और धोखाधड़ी से होती थी — उन्हें अच्छे वेतन और सुविधाओं का लालच दिया जाता था
  • बागानों में इनकी स्थिति नव-दासता (New System of Slavery) जैसी थी — कम वेतन, कठोर कार्य परिस्थितियाँ, अनुबंध तोड़ने पर सजा
  • इन मजदूरों ने विदेशों में जाकर नई संस्कृतियाँ विकसित कीं — जैसे त्रिनिडाड का 'होसे' (मुहर्रम का रूपांतरण)
प्रश्न 3: महामंदी (Great Depression) के कारण और भारत पर इसके प्रभाव बताइए।

महामंदी के कारण:

  • 1920 के दशक में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अति-उत्पादन — कृषि और औद्योगिक उत्पाद माँग से अधिक
  • शेयर बाजार में सट्टा — 1929 में Wall Street Crash ने बाजार को ध्वस्त कर दिया
  • बैंकिंग संकट — बैंकों ने बड़े पैमाने पर ऋण दिए जो वापस नहीं आए, हजारों बैंक बंद हुए
  • अमेरिका ने यूरोप को ऋण देना बंद किया और पुराने ऋण वापस माँगे

भारत पर प्रभाव:

  • कृषि उत्पादों (जूट, कपास, गेहूँ) की कीमतें 50% से अधिक गिरीं
  • किसानों की आय घटी लेकिन सरकारी लगान कम नहीं हुआ
  • किसान कर्ज में डूबे और कई को जमीन बेचनी पड़ी
  • शहरों में बेरोजगारी बढ़ी, कारखाने बंद हुए
  • इसने राष्ट्रीय आंदोलन को तेज किया — 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ
प्रश्न 4: ब्रेटन वुड्स समझौते (Bretton Woods Agreement) का क्या महत्व था?

जुलाई 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स (New Hampshire) में मित्र राष्ट्रों का सम्मेलन हुआ। इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना था:

  • IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) की स्थापना — सदस्य देशों के भुगतान संतुलन में सहायता और विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखना
  • विश्व बैंक (IBRD) की स्थापना — युद्ध से तबाह देशों के पुनर्निर्माण और विकासशील देशों को ऋण देना
  • निश्चित विनिमय दर प्रणाली — सभी मुद्राओं को अमेरिकी डॉलर से और डॉलर को सोने से जोड़ा गया ($35 = 1 oz gold)
  • इस व्यवस्था ने 1950-70 के दशक में वैश्विक व्यापार और विकास को बढ़ावा दिया
  • हालांकि, इन संस्थाओं पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभुत्व रहा जिसका विकासशील देशों ने विरोध किया
प्रश्न 5: 19वीं सदी में यूरोपीय उपनिवेशवाद ने अफ्रीका पर क्या प्रभाव डाला?

19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका पर कब्जा किया जिसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा:

  • 1885 का बर्लिन सम्मेलन: यूरोपीय शक्तियों ने बिना अफ्रीकी लोगों की सहमति के अफ्रीका को आपस में बाँट लिया
  • भूमि और संसाधनों पर कब्जा: अफ्रीकी लोगों को उनकी जमीन से बेदखल किया गया और बागानों और खदानों में बेगार कराई गई
  • जबरन श्रम: भारी करों और पास प्रणाली (Pass System) से अफ्रीकियों को मजदूरी करने पर मजबूर किया गया
  • पशु महामारी (Rinderpest): 1890 के दशक में यूरोपी मवेशियों से आई रिंडरपेस्ट बीमारी ने अफ्रीकी पशुओं को नष्ट कर दिया, जिससे अफ्रीकी लोग और निर्धन हो गए
  • सांस्कृतिक विनाश: स्थानीय परंपराओं, भाषाओं और सामाजिक व्यवस्थाओं को नुकसान पहुँचा

🎯 प्रश्न बैंक — Question Bank

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. ब्रिटेन में कॉर्न लॉज (Corn Laws) का उन्मूलन कब हुआ?
  • A) 1815
  • B) 1830
  • C) 1846
  • D) 1870
✅ सही उत्तर: C) 1846 — 1846 में ब्रिटेन में कॉर्न लॉज का उन्मूलन किया गया जिससे खाद्यान्न आयात पर से प्रतिबंध हट गया।
2. महामंदी (Great Depression) किस वर्ष शुरू हुई?
  • A) 1929
  • B) 1919
  • C) 1939
  • D) 1944
✅ सही उत्तर: A) 1929 — 1929 में अमेरिका में शेयर बाजार के ध्वस्त होने से महामंदी शुरू हुई जो 1930 के दशक के मध्य तक चली।
3. ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (Bretton Woods Conference) कब हुआ?
  • A) 1939
  • B) 1945
  • C) 1947
  • D) 1944
✅ सही उत्तर: D) 1944 — जुलाई 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स में सम्मेलन हुआ जहाँ IMF और विश्व बैंक की स्थापना का निर्णय लिया गया।
4. रिंडरपेस्ट (Rinderpest) क्या थी?
  • A) एक व्यापार मार्ग
  • B) एक पशु महामारी
  • C) एक श्रम कानून
  • D) एक मुद्रा प्रणाली
✅ सही उत्तर: B) एक पशु महामारी — रिंडरपेस्ट 1890 के दशक में अफ्रीका में फैली एक भयंकर पशु महामारी थी जिसने अफ्रीकी मवेशियों को नष्ट कर दिया।
5. G-77 (Group of 77) का गठन किस उद्देश्य से हुआ?
  • A) सैन्य गठबंधन बनाने के लिए
  • B) शीत युद्ध में भाग लेने के लिए
  • C) नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की माँग के लिए
  • D) यूरोपीय एकीकरण के लिए
✅ सही उत्तर: C) नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की माँग के लिए — G-77 विकासशील देशों का समूह था जिसने अपने संसाधनों पर अधिक नियंत्रण और उचित व्यापार शर्तों की माँग की।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer)

1. 'तीन प्रवाह' (Three Flows) से क्या अभिप्राय है?

अर्थशास्त्रियों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन प्रवाह होते हैं: (1) व्यापार का प्रवाह (Trade Flow) — वस्तुओं का एक देश से दूसरे देश में व्यापार, (2) श्रम का प्रवाह (Labour Flow) — लोगों का रोजगार की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास, और (3) पूँजी का प्रवाह (Capital Flow) — अल्पकालिक और दीर्घकालिक निवेश तथा ऋण के रूप में धन का एक देश से दूसरे देश में प्रवाह। ये तीनों प्रवाह मिलकर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं।

2. प्रथम विश्व युद्ध के आर्थिक प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन करें।

प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के गंभीर आर्थिक प्रभाव पड़े: (1) लगभग 90 लाख सैनिक और 2 करोड़ नागरिक मारे गए जिससे कार्यशील जनसंख्या घटी, (2) यूरोपीय देशों पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ा — ब्रिटेन विश्व का सबसे बड़ा ऋणदाता से ऋणी बन गया, (3) अमेरिका विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनकर उभरा, (4) औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के बाद युद्धोपरांत माँग घटने से बेरोजगारी बढ़ी, और (5) कृषि क्षेत्र में अति-उत्पादन की समस्या पैदा हुई।

3. IMF और विश्व बैंक में क्या अंतर है?

IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष): इसका मुख्य कार्य सदस्य देशों की मुद्रा विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखना और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के संकट में अल्पकालिक ऋण देना है। विश्व बैंक (IBRD): इसका मुख्य कार्य युद्ध से तबाह देशों का पुनर्निर्माण और विकासशील देशों को दीर्घकालिक विकास ऋण देना है। दोनों संस्थाओं की स्थापना 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में हुई और दोनों पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभुत्व रहा है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer)

1. 19वीं सदी में विश्व अर्थव्यवस्था कैसे बदली? व्यापार, श्रम और पूँजी के प्रवाह के संदर्भ में वर्णन करें।

19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति, औपनिवेशिक विस्तार और तकनीकी प्रगति ने विश्व अर्थव्यवस्था को मूलभूत रूप से बदल दिया:

व्यापार का प्रवाह: 1846 में ब्रिटेन में कॉर्न लॉज के उन्मूलन के बाद मुक्त व्यापार का दौर शुरू हुआ। ब्रिटेन जैसे औद्योगिक देशों ने उपनिवेशों से कच्चा माल (कपास, जूट, नील) आयात किया और तैयार माल निर्यात किया। रेलवे और जहाजरानी ने व्यापार को तेज किया। भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका मुख्यतः कच्चे माल के निर्यातक बने।

श्रम का प्रवाह: यूरोप से लाखों लोग अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य नई बसी भूमियों पर गए। भारत और चीन से गिरमिटिया मजदूर कैरेबियन, मॉरीशस, फिजी और दक्षिण-पूर्व एशिया में बागानों पर काम करने गए। यह प्रवास अक्सर शोषणपूर्ण था।

पूँजी का प्रवाह: ब्रिटेन और यूरोपीय देशों ने उपनिवेशों में भारी निवेश किया — रेलवे, बंदरगाह, खदानें और बागान। लंदन विश्व का वित्तीय केंद्र बन गया। यह पूँजी प्रवाह मुख्यतः औपनिवेशिक शोषण के लिए था।

इस प्रकार 19वीं सदी में एक असमान वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ जिसमें कुछ औद्योगिक देश समृद्ध हुए जबकि उपनिवेश गरीबी और शोषण का शिकार बने।

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