The Age of Industrialisation
जब हम औद्योगीकरण (Industrialisation) की बात करते हैं तो सामान्यतः मशीनों, कारखानों और बड़े पैमाने पर उत्पादन का चित्र उभरता है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। औद्योगीकरण कोई अचानक होने वाली घटना नहीं थी — यह एक क्रमिक प्रक्रिया थी जिसमें हाथ के श्रम और मशीनों का उत्पादन लंबे समय तक साथ-साथ चलता रहा।
इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) से लेकर कारखाना प्रणाली (Factory System) तक का विकास हुआ, ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति कैसी थी और भारत में औद्योगीकरण का क्या स्वरूप रहा।
17वीं-18वीं सदी में यूरोप में आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) का दौर था। इसमें बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता था लेकिन कारखानों में नहीं बल्कि ग्रामीण घरों में।
यह व्यवस्था Putting-Out System कहलाती थी क्योंकि व्यापारी कच्चा माल कारीगरों को 'put out' (देते) थे और तैयार माल वापस लेते थे। यह कारखाना प्रणाली से पहले का चरण था।
18वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) शुरू हुई। लेकिन यह 'क्रांति' उतनी तेज नहीं थी जितनी हम सोचते हैं। 19वीं सदी की शुरुआत में भी ब्रिटेन का अधिकांश उत्पादन हाथ के श्रम (Hand Labour) से ही होता था।
ब्रिटेन में भी मशीनों का प्रसार धीमा था क्योंकि: (1) नई तकनीक महँगी थी और अक्सर खराब हो जाती थी, (2) जहाँ सस्ता श्रम उपलब्ध था वहाँ मशीनों की जरूरत कम थी, (3) कई उद्योगों में हस्तकौशल (Handcraft) की गुणवत्ता मशीनों से बेहतर थी, और (4) कुछ वस्तुओं — जैसे कपड़ों की बारीक डिजाइन — में मानव हाथ मशीनों से बेहतर काम करते थे।
भारत में औद्योगीकरण का इतिहास दो चरणों में बँटा है — पहला, ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय हस्तशिल्प (Handicrafts) का पतन और दूसरा, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय कारखानों का विकास।
19वीं सदी के मध्य से भारत में आधुनिक कारखानों की शुरुआत हुई। 1854 में बम्बई (मुंबई) में पहली कपास मिल खुली। 1855 में कलकत्ता (कोलकाता) के पास जूट मिल शुरू हुई। भारतीय उद्योगपतियों में द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी नुसेरवानजी टाटा और सेठ हुकुमचंद प्रमुख थे। बम्बई मुख्यतः कपास उद्योग का और कलकत्ता जूट उद्योग का केंद्र बना।
औद्योगीकरण के साथ फैक्ट्री मजदूरों (Factory Workers) की दशा अत्यंत कठिन थी। ब्रिटेन और भारत दोनों में मजदूरों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा।
मौसम के अनुसार मजदूरों की माँग बदलती थी। कई मजदूर प्रवासी (Migrant) थे — गाँव से शहर काम करने आते और फसल कटाई के समय वापस लौट जाते। कारखाना मालिकों ने इसका फायदा उठाया और मजदूरी कम रखी।
औद्योगीकरण के दौर में उत्पादों को बेचने के लिए विज्ञापन (Advertisement) का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ। ब्रिटिश और भारतीय दोनों निर्माताओं ने अपने उत्पादों के लिए आकर्षक लेबल और विज्ञापन बनाए।
इस प्रकार औद्योगीकरण केवल उत्पादन की प्रक्रिया नहीं थी बल्कि इसने बाजार, विज्ञापन, श्रम और समाज सभी को गहराई से प्रभावित किया। भारत में औद्योगीकरण का स्वरूप ब्रिटेन से भिन्न था — यहाँ छोटे पैमाने के उद्योग (Small-scale Industries) और हस्तशिल्प लंबे समय तक महत्वपूर्ण बने रहे।
आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) 17वीं-18वीं सदी में यूरोप में कारखानों के उदय से पहले के औद्योगिक उत्पादन के चरण को कहते हैं:
ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बावजूद हाथ के श्रम (Hand Labour) का महत्व बना रहा। इसके कारण:
18वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक था। लेकिन 19वीं सदी में भारतीय वस्त्र उद्योग का पतन हुआ:
जॉबर (Jobber) भारतीय कारखानों में मजदूरों की भर्ती करने वाले बिचौलिये (Middlemen) थे:
औद्योगीकरण ने बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया जिससे उत्पादों को बेचने के लिए विज्ञापन अनिवार्य हो गया:
Putting-Out System आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) काल की एक उत्पादन व्यवस्था थी। इसमें व्यापारी (Merchants) शहरों में ऑर्डर लेते थे और ग्रामीण क्षेत्रों में कारीगरों को कच्चा माल देते ('put out' करते) थे। कारीगर अपने घरों में हाथ से माल तैयार करते और व्यापारी तैयार माल वापस लेकर बाजार में बेचते। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलती थी और व्यापारी शहरी गिल्ड प्रतिबंधों से बच जाते थे।
19वीं सदी के मध्य से भारत में आधुनिक कारखानों का विकास शुरू हुआ। 1854 में बम्बई (मुंबई) में पहली कपास मिल और 1855 में कलकत्ता (कोलकाता) के पास पहली जूट मिल स्थापित हुई। प्रारंभ में अधिकांश पूँजी ब्रिटिश थी, लेकिन धीरे-धीरे भारतीय उद्यमी — जैसे द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी टाटा, सेठ हुकुमचंद — ने भी कारखाने स्थापित किए। बम्बई कपास उद्योग का और कलकत्ता जूट उद्योग का केंद्र बना। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया क्योंकि ब्रिटेन से आयात कम हुआ।
औद्योगीकरण ने मजदूरों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। शहरों में मजदूरों की संख्या बढ़ी लेकिन रोजगार के अवसर सीमित रहे, जिससे बेरोजगारी बढ़ी। मजदूरों को कम वेतन (कभी-कभी जीवन-निर्वाह से भी कम) पर 12-16 घंटे काम करना पड़ता था। महिलाओं और बच्चों से भी कारखानों में काम कराया जाता। भारत में जॉबर प्रणाली ने मजदूरों के शोषण को और बढ़ाया। कार्य परिस्थितियाँ खतरनाक थीं — भीड़भाड़, गंदगी, दुर्घटनाओं का खतरा। कई मजदूर प्रवासी थे जो गाँव से शहर आते-जाते रहते थे।
18वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक था। भारतीय मसलिन (Muslin) और कैलिको (Calico) कपड़े यूरोप, एशिया और अफ्रीका में प्रसिद्ध थे। लेकिन ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति और औपनिवेशिक नीतियों ने इस उद्योग को नष्ट कर दिया:
व्यापारिक नीतियाँ: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कपड़ों के ब्रिटेन में आयात पर भारी शुल्क (70-80%) लगाया। साथ ही ब्रिटिश मशीनी कपड़ों को भारत में शुल्क-मुक्त या कम शुल्क पर प्रवेश दिया गया। इससे भारतीय कपड़े ब्रिटिश बाजार से बाहर हो गए और भारतीय बाजार सस्ते ब्रिटिश कपड़ों से भर गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका: कंपनी ने भारतीय बुनकरों को गुमाश्तों (Agents) के माध्यम से नियंत्रित किया। बुनकरों को अग्रिम राशि (Advance) देकर बाँधा जाता था और कम कीमत पर माल खरीदा जाता था। उन्हें अन्य व्यापारियों से काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया।
कच्चे माल की कमी: भारतीय कपास का निर्यात ब्रिटिश मिलों को बढ़ा जिससे भारतीय बुनकरों को कच्चा माल महँगा और दुर्लभ हो गया।
परिणाम: लाखों भारतीय बुनकर, कारीगर और शिल्पकार बेरोजगार हो गए। कई को खेती पर निर्भर होना पड़ा जिससे कृषि पर दबाव बढ़ा। भारतीय शहर — जैसे ढाका, मुर्शिदाबाद, सूरत — जो कभी समृद्ध व्यापारिक केंद्र थे, जनसंख्या में गिरावट देखने लगे। इस प्रक्रिया को 'विऔद्योगीकरण' (De-industrialisation) कहा जाता है।