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अध्याय 4 · इतिहास · कक्षा 10

औद्योगीकरण का युग

The Age of Industrialisation

🔍 परिचय — Introduction

जब हम औद्योगीकरण (Industrialisation) की बात करते हैं तो सामान्यतः मशीनों, कारखानों और बड़े पैमाने पर उत्पादन का चित्र उभरता है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। औद्योगीकरण कोई अचानक होने वाली घटना नहीं थी — यह एक क्रमिक प्रक्रिया थी जिसमें हाथ के श्रम और मशीनों का उत्पादन लंबे समय तक साथ-साथ चलता रहा।

इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) से लेकर कारखाना प्रणाली (Factory System) तक का विकास हुआ, ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति कैसी थी और भारत में औद्योगीकरण का क्या स्वरूप रहा।

1. औद्योगीकरण से पहले — Proto-Industrialisation

17वीं-18वीं सदी में यूरोप में आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) का दौर था। इसमें बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता था लेकिन कारखानों में नहीं बल्कि ग्रामीण घरों में।

आद्य-औद्योगीकरण की प्रमुख विशेषताएँ:

  • व्यापारी (Merchants) शहरों में ऑर्डर लेते और ग्रामीण कारीगरों को काम देते थे
  • कारीगर अपने घरों में ही हाथ से उत्पादन करते — कपड़ा बुनना, धातु का काम
  • पूरा परिवार उत्पादन में भाग लेता — पुरुष, महिलाएँ और बच्चे
  • यह प्रणाली गिल्ड (Guild/श्रेणी) व्यवस्था से बाहर थी — शहरी गिल्ड ने उत्पादन पर प्रतिबंध लगाए थे
  • किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का स्रोत था — खेती के साथ-साथ कताई-बुनाई

यह व्यवस्था Putting-Out System कहलाती थी क्योंकि व्यापारी कच्चा माल कारीगरों को 'put out' (देते) थे और तैयार माल वापस लेते थे। यह कारखाना प्रणाली से पहले का चरण था।

2. औद्योगिक परिवर्तन का युग

18वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) शुरू हुई। लेकिन यह 'क्रांति' उतनी तेज नहीं थी जितनी हम सोचते हैं। 19वीं सदी की शुरुआत में भी ब्रिटेन का अधिकांश उत्पादन हाथ के श्रम (Hand Labour) से ही होता था।

📌 ब्रिटेन में प्रमुख आविष्कार और उद्योग:

  • कपास उद्योग (Cotton Industry): सबसे पहले मशीनीकरण — 1764 में स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) — जेम्स हारग्रीव्ज ने बनाई
  • भाप का इंजन (Steam Engine): जेम्स वॉट ने 1781 में सुधार किया — कारखानों और रेलवे में उपयोग
  • लोहा उद्योग (Iron Industry): रेलवे, पुलों और मशीनों के निर्माण में लोहे की माँग बढ़ी
  • 1840 के दशक तक केवल कपास और धातु उद्योगों में ही तकनीकी परिवर्तन हुआ
  • अन्य उद्योगों में हाथ की तकनीक (Hand Technology) लंबे समय तक प्रचलित रही

ब्रिटेन में भी मशीनों का प्रसार धीमा था क्योंकि: (1) नई तकनीक महँगी थी और अक्सर खराब हो जाती थी, (2) जहाँ सस्ता श्रम उपलब्ध था वहाँ मशीनों की जरूरत कम थी, (3) कई उद्योगों में हस्तकौशल (Handcraft) की गुणवत्ता मशीनों से बेहतर थी, और (4) कुछ वस्तुओं — जैसे कपड़ों की बारीक डिजाइन — में मानव हाथ मशीनों से बेहतर काम करते थे।

3. भारत में औद्योगीकरण

भारत में औद्योगीकरण का इतिहास दो चरणों में बँटा है — पहला, ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय हस्तशिल्प (Handicrafts) का पतन और दूसरा, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय कारखानों का विकास।

भारतीय वस्त्र उद्योग का पतन:

  • 18वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक था — मसलिन (Muslin), कैलिको (Calico)
  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सस्ते मशीनी कपड़े भारत में बेचे
  • ब्रिटेन ने भारतीय कपड़ों के आयात पर भारी शुल्क लगाया जबकि ब्रिटिश कपड़ों को भारत में शुल्क-मुक्त प्रवेश दिया
  • भारतीय बुनकरों (Weavers) की आय घटी और लाखों कारीगर बेरोजगार हुए

19वीं सदी के मध्य से भारत में आधुनिक कारखानों की शुरुआत हुई। 1854 में बम्बई (मुंबई) में पहली कपास मिल खुली। 1855 में कलकत्ता (कोलकाता) के पास जूट मिल शुरू हुई। भारतीय उद्योगपतियों में द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी नुसेरवानजी टाटा और सेठ हुकुमचंद प्रमुख थे। बम्बई मुख्यतः कपास उद्योग का और कलकत्ता जूट उद्योग का केंद्र बना।

4. फैक्ट्री मजदूरों की दशा

औद्योगीकरण के साथ फैक्ट्री मजदूरों (Factory Workers) की दशा अत्यंत कठिन थी। ब्रिटेन और भारत दोनों में मजदूरों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा।

📌 मजदूरों की प्रमुख समस्याएँ:

  • कम वेतन: मजदूरों को बहुत कम मजदूरी दी जाती — कभी-कभी जीवन-निर्वाह से भी कम
  • लंबे कार्य घंटे: 12-16 घंटे तक काम, कोई छुट्टी नहीं
  • बेरोजगारी: शहरों में मजदूरों की संख्या माँग से अधिक थी, इसलिए नौकरी पाना कठिन
  • जॉबर (Jobber) प्रणाली: भारत में मजदूरों की भर्ती जॉबर (बिचौलिया) करता था — वह गाँव से लोगों को लाता, नौकरी दिलवाता और बदले में उनसे पैसे और वफादारी की माँग करता
  • खराब कार्य परिस्थितियाँ: भीड़भाड़, गंदगी, दुर्घटनाओं का खतरा
  • महिला और बाल श्रम: महिलाओं और बच्चों को भी कम वेतन पर कारखानों में काम करना पड़ता

मौसम के अनुसार मजदूरों की माँग बदलती थी। कई मजदूर प्रवासी (Migrant) थे — गाँव से शहर काम करने आते और फसल कटाई के समय वापस लौट जाते। कारखाना मालिकों ने इसका फायदा उठाया और मजदूरी कम रखी।

5. बाजार के लिए उत्पाद — Products for the Market

औद्योगीकरण के दौर में उत्पादों को बेचने के लिए विज्ञापन (Advertisement) का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ। ब्रिटिश और भारतीय दोनों निर्माताओं ने अपने उत्पादों के लिए आकर्षक लेबल और विज्ञापन बनाए।

विज्ञापन और बाजार:

  • मैनचेस्टर के कपड़ा निर्माताओं ने भारतीय बाजार के लिए भारतीय देवी-देवताओं और शाही चिह्नों वाले लेबल बनाए
  • ब्रिटिश निर्माताओं ने "Made in Manchester" लिखे लेबल से गुणवत्ता का दावा किया
  • भारतीय निर्माताओं ने स्वदेशी भावना का उपयोग किया — कपड़ों पर राष्ट्रीय प्रतीक छापे
  • कैलेंडर, अखबारों और होर्डिंग्स के माध्यम से विज्ञापन का प्रसार हुआ
  • स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उत्पादों को बढ़ावा दिया — विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई

इस प्रकार औद्योगीकरण केवल उत्पादन की प्रक्रिया नहीं थी बल्कि इसने बाजार, विज्ञापन, श्रम और समाज सभी को गहराई से प्रभावित किया। भारत में औद्योगीकरण का स्वरूप ब्रिटेन से भिन्न था — यहाँ छोटे पैमाने के उद्योग (Small-scale Industries) और हस्तशिल्प लंबे समय तक महत्वपूर्ण बने रहे।

⚡ त्वरित पुनरावृत्ति — Quick Revision

📌 महत्वपूर्ण तिथियाँ

  • 1764 — स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) का आविष्कार — जेम्स हारग्रीव्ज
  • 1781 — जेम्स वॉट ने भाप के इंजन (Steam Engine) में सुधार किया
  • 1854 — बम्बई में पहली कपास मिल की स्थापना
  • 1855 — कलकत्ता के पास पहली जूट मिल शुरू
  • 1900 — भारत में कपड़ा मिलों की संख्या 194 तक पहुँची
  • 1907 — जमशेदजी टाटा ने TISCO (टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी) की स्थापना की
  • 1911 — TISCO ने जमशेदपुर में उत्पादन शुरू किया

📌 महत्वपूर्ण शब्दावली

  • आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) — कारखानों से पहले का औद्योगिक उत्पादन — घरों में हाथ से
  • स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) — 1764 में बनी कताई मशीन जो एक साथ कई तकलियाँ चला सकती थी
  • फ्लाई शटल (Fly Shuttle) — बुनाई की गति बढ़ाने वाला उपकरण
  • जॉबर (Jobber) — भारतीय कारखानों में मजदूरों की भर्ती करने वाला बिचौलिया
  • गिल्ड (Guild) — शहरों में कारीगरों के पेशेवर संगठन जो उत्पादन नियंत्रित करते थे
  • स्टेपलर्स (Staplers) — ऊन को रेशों के अनुसार छाँटने वाले
  • फुलर्स (Fullers) — ऊनी कपड़ों को सिकोड़कर गाढ़ा करने वाले
  • कैलिको (Calico) — कालीकट (केरल) से निर्यात होने वाला सूती कपड़ा

📌 प्रमुख उद्योग

  • ब्रिटेन — कपास उद्योग: मैनचेस्टर और लिवरपूल — स्पिनिंग जेनी, पावर लूम
  • ब्रिटेन — लोहा उद्योग: रेलवे, पुल, जहाज निर्माण
  • भारत — कपास मिलें: बम्बई (मुंबई) — भारतीय और ब्रिटिश उद्यमी
  • भारत — जूट मिलें: कलकत्ता (कोलकाता) — मुख्यतः ब्रिटिश पूँजी
  • भारत — लोहा-इस्पात: TISCO, जमशेदपुर (1907)

📌 तुलना — ब्रिटेन vs भारत में औद्योगीकरण

  • शुरुआत: ब्रिटेन — 18वीं सदी | भारत — 19वीं सदी का मध्य
  • स्वरूप: ब्रिटेन — कारखाना प्रणाली प्रमुख | भारत — हस्तशिल्प + कारखाने साथ-साथ
  • पूँजी: ब्रिटेन — स्थानीय पूँजी | भारत — ब्रिटिश + भारतीय पूँजी
  • श्रम: ब्रिटेन — ग्रामीण प्रवासी मजदूर | भारत — जॉबर प्रणाली द्वारा भर्ती
  • बाजार: ब्रिटेन — विश्व बाजार पर कब्जा | भारत — ब्रिटिश नीतियों से सीमित
  • प्रभाव: ब्रिटेन — विश्व शक्ति बना | भारत — उपनिवेशी शोषण जारी

📖 पाठ्यपुस्तक प्रश्न-उत्तर — NCERT Solutions

प्रश्न 1: आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) से क्या तात्पर्य है?

आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) 17वीं-18वीं सदी में यूरोप में कारखानों के उदय से पहले के औद्योगिक उत्पादन के चरण को कहते हैं:

  • इसमें बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था लेकिन कारखानों में नहीं बल्कि ग्रामीण घरों में
  • व्यापारी शहरों से ऑर्डर लाते और गाँवों में कारीगरों को कच्चा माल देते थे
  • कारीगर अपने परिवार के साथ घर पर ही कताई, बुनाई आदि का काम करते थे
  • यह Putting-Out System कहलाती थी
  • किसानों को खेती के अलावा अतिरिक्त आय मिलती थी
  • यह शहरी गिल्ड (Guild) प्रतिबंधों से बचने का तरीका भी था
प्रश्न 2: ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति में हाथ के श्रम का महत्व क्यों बना रहा?

ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बावजूद हाथ के श्रम (Hand Labour) का महत्व बना रहा। इसके कारण:

  • सीमित मशीनीकरण: केवल कपास और धातु उद्योगों में ही मशीनें आईं — अन्य उद्योगों में हाथ का काम जारी रहा
  • तकनीक की सीमाएँ: नई मशीनें महँगी थीं, अक्सर खराब होती थीं और मरम्मत कठिन थी
  • सस्ता श्रम उपलब्ध: गाँवों से शहरों में आए प्रवासी मजदूरों की बहुतायत थी — मशीनों से सस्ता
  • गुणवत्ता: कुछ वस्तुओं — जैसे बारीक डिजाइन वाले कपड़े, बूट-जूते — में हाथ का काम मशीनों से बेहतर गुणवत्ता का था
  • विविधता: बाजार में विविध डिजाइन और आकार की माँग थी जो मशीनों से पूरी नहीं हो सकती थी
  • मौसमी माँग: क्रिसमस जैसे त्योहारों पर माँग बढ़ती तो अतिरिक्त हाथ के मजदूर रखे जाते
प्रश्न 3: भारतीय वस्त्र उद्योग के पतन के क्या कारण थे?

18वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक था। लेकिन 19वीं सदी में भारतीय वस्त्र उद्योग का पतन हुआ:

  • ब्रिटिश सरकार की नीतियाँ: भारतीय कपड़ों के ब्रिटेन में आयात पर भारी शुल्क लगाया गया जबकि ब्रिटिश कपड़ों को भारत में शुल्क-मुक्त प्रवेश दिया गया
  • मशीनी कपड़ों की प्रतिस्पर्धा: मैनचेस्टर का सस्ता मशीनी कपड़ा भारतीय बाजार में आया जिससे हाथ से बने कपड़ों की माँग घटी
  • ईस्ट इंडिया कंपनी: कंपनी ने भारतीय बुनकरों को कम कीमत पर माल बेचने पर मजबूर किया और उनके लिए अन्य व्यापारियों से काम लेना प्रतिबंधित किया
  • कच्चे माल की कमी: कपास का निर्यात ब्रिटेन को बढ़ा जिससे भारतीय बुनकरों को कच्चा माल महँगा मिलने लगा
  • लाखों बुनकर और कारीगर बेरोजगार हो गए — कई को खेती पर निर्भर होना पड़ा
प्रश्न 4: जॉबर (Jobber) कौन थे? उनकी क्या भूमिका थी?

जॉबर (Jobber) भारतीय कारखानों में मजदूरों की भर्ती करने वाले बिचौलिये (Middlemen) थे:

  • जॉबर स्वयं एक पुराना और विश्वसनीय मजदूर होता था जिसे कारखाना मालिक मजदूरों की भर्ती का काम सौंपता था
  • वह अपने गाँव या जाति के लोगों को शहर में लाता और उन्हें नौकरी दिलवाता था
  • वह नए मजदूरों को शहर में रहने और काम सीखने में मदद करता था
  • बदले में जॉबर मजदूरों से कमीशन और वफादारी की माँग करता था
  • जॉबर प्रणाली से कारखाना मालिकों को सस्ता और आज्ञाकारी श्रम मिलता था
  • मजदूर जॉबर पर निर्भर हो जाते थे जिससे उनका शोषण होता था
प्रश्न 5: औद्योगीकरण के दौर में विज्ञापन (Advertisement) का क्या महत्व था?

औद्योगीकरण ने बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया जिससे उत्पादों को बेचने के लिए विज्ञापन अनिवार्य हो गया:

  • मैनचेस्टर के निर्माताओं ने भारतीय बाजार के लिए विशेष लेबल बनाए — इन पर भारतीय देवी-देवताओं के चित्र छापे ताकि भारतीय ग्राहक आकर्षित हों
  • कुछ लेबलों पर शाही चिह्न और ब्रिटिश राजा-रानी के चित्र होते थे — इससे गुणवत्ता का भरोसा दिलाया जाता
  • भारतीय निर्माताओं ने स्वदेशी भावना का उपयोग किया — कपड़ों पर राष्ट्रीय प्रतीक (तिरंगा, भारत माता) छापे
  • विज्ञापनों ने उपभोक्ता संस्कृति (Consumer Culture) को बढ़ावा दिया
  • अखबारों, कैलेंडरों और होर्डिंग्स के माध्यम से विज्ञापनों का प्रसार हुआ

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बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) का आविष्कार किसने किया?
  • A) जेम्स वॉट
  • B) जेम्स हारग्रीव्ज
  • C) रिचर्ड आर्कराइट
  • D) एडमंड कार्टराइट
✅ सही उत्तर: B) जेम्स हारग्रीव्ज — जेम्स हारग्रीव्ज ने 1764 में स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किया जो एक साथ कई तकलियों पर कताई कर सकती थी।
2. बम्बई (मुंबई) में पहली कपास मिल कब स्थापित हुई?
  • A) 1840
  • B) 1850
  • C) 1854
  • D) 1860
✅ सही उत्तर: C) 1854 — 1854 में बम्बई (मुंबई) में पहली कपास मिल की स्थापना हुई।
3. TISCO (टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी) की स्थापना कब हुई?
  • A) 1854
  • B) 1890
  • C) 1900
  • D) 1907
✅ सही उत्तर: D) 1907 — जमशेदजी नुसेरवानजी टाटा ने 1907 में TISCO की स्थापना की जिसने 1911 में जमशेदपुर में उत्पादन शुरू किया।
4. 'जॉबर' (Jobber) का क्या कार्य था?
  • A) कारखानों में मजदूरों की भर्ती करना
  • B) मशीनों का आविष्कार करना
  • C) कपड़ों का निर्यात करना
  • D) कर वसूलना
✅ सही उत्तर: A) कारखानों में मजदूरों की भर्ती करना — जॉबर भारतीय कारखानों में बिचौलिये (Middlemen) थे जो गाँवों से मजदूरों को लाते और नौकरी दिलवाते थे।
5. 'फ्लाई शटल' (Fly Shuttle) का उपयोग किसमें होता था?
  • A) कताई में
  • B) बुनाई में
  • C) रंगाई में
  • D) सिलाई में
✅ सही उत्तर: B) बुनाई में — फ्लाई शटल बुनाई की गति बढ़ाने वाला एक उपकरण था जिसने बुनकरों की उत्पादकता में वृद्धि की।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer)

1. 'Putting-Out System' क्या थी?

Putting-Out System आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) काल की एक उत्पादन व्यवस्था थी। इसमें व्यापारी (Merchants) शहरों में ऑर्डर लेते थे और ग्रामीण क्षेत्रों में कारीगरों को कच्चा माल देते ('put out' करते) थे। कारीगर अपने घरों में हाथ से माल तैयार करते और व्यापारी तैयार माल वापस लेकर बाजार में बेचते। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलती थी और व्यापारी शहरी गिल्ड प्रतिबंधों से बच जाते थे।

2. भारत में कारखानों का विकास कैसे हुआ?

19वीं सदी के मध्य से भारत में आधुनिक कारखानों का विकास शुरू हुआ। 1854 में बम्बई (मुंबई) में पहली कपास मिल और 1855 में कलकत्ता (कोलकाता) के पास पहली जूट मिल स्थापित हुई। प्रारंभ में अधिकांश पूँजी ब्रिटिश थी, लेकिन धीरे-धीरे भारतीय उद्यमी — जैसे द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी टाटा, सेठ हुकुमचंद — ने भी कारखाने स्थापित किए। बम्बई कपास उद्योग का और कलकत्ता जूट उद्योग का केंद्र बना। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया क्योंकि ब्रिटेन से आयात कम हुआ।

3. औद्योगीकरण ने मजदूरों के जीवन को कैसे प्रभावित किया?

औद्योगीकरण ने मजदूरों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। शहरों में मजदूरों की संख्या बढ़ी लेकिन रोजगार के अवसर सीमित रहे, जिससे बेरोजगारी बढ़ी। मजदूरों को कम वेतन (कभी-कभी जीवन-निर्वाह से भी कम) पर 12-16 घंटे काम करना पड़ता था। महिलाओं और बच्चों से भी कारखानों में काम कराया जाता। भारत में जॉबर प्रणाली ने मजदूरों के शोषण को और बढ़ाया। कार्य परिस्थितियाँ खतरनाक थीं — भीड़भाड़, गंदगी, दुर्घटनाओं का खतरा। कई मजदूर प्रवासी थे जो गाँव से शहर आते-जाते रहते थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer)

1. ब्रिटिश शासन ने भारतीय हस्तशिल्प उद्योग को कैसे नष्ट किया? विस्तार से वर्णन करें।

18वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक था। भारतीय मसलिन (Muslin) और कैलिको (Calico) कपड़े यूरोप, एशिया और अफ्रीका में प्रसिद्ध थे। लेकिन ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति और औपनिवेशिक नीतियों ने इस उद्योग को नष्ट कर दिया:

व्यापारिक नीतियाँ: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कपड़ों के ब्रिटेन में आयात पर भारी शुल्क (70-80%) लगाया। साथ ही ब्रिटिश मशीनी कपड़ों को भारत में शुल्क-मुक्त या कम शुल्क पर प्रवेश दिया गया। इससे भारतीय कपड़े ब्रिटिश बाजार से बाहर हो गए और भारतीय बाजार सस्ते ब्रिटिश कपड़ों से भर गया।

ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका: कंपनी ने भारतीय बुनकरों को गुमाश्तों (Agents) के माध्यम से नियंत्रित किया। बुनकरों को अग्रिम राशि (Advance) देकर बाँधा जाता था और कम कीमत पर माल खरीदा जाता था। उन्हें अन्य व्यापारियों से काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया।

कच्चे माल की कमी: भारतीय कपास का निर्यात ब्रिटिश मिलों को बढ़ा जिससे भारतीय बुनकरों को कच्चा माल महँगा और दुर्लभ हो गया।

परिणाम: लाखों भारतीय बुनकर, कारीगर और शिल्पकार बेरोजगार हो गए। कई को खेती पर निर्भर होना पड़ा जिससे कृषि पर दबाव बढ़ा। भारतीय शहर — जैसे ढाका, मुर्शिदाबाद, सूरत — जो कभी समृद्ध व्यापारिक केंद्र थे, जनसंख्या में गिरावट देखने लगे। इस प्रक्रिया को 'विऔद्योगीकरण' (De-industrialisation) कहा जाता है।

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