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Announcement · राष्ट्रीय गीत की 150वीं वर्षगाँठ

वंदे मातरम् के 150 वर्ष

एक तराना, जो आंदोलन बन गया — एक कविता, जो राष्ट्रीय चेतना बन गई
📅 7 नवंबर 2025 — 150वीं वर्षगाँठ 📜 रचयिता: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (1838–1894) 🎶 संगीत: रवींद्रनाथ टैगोर 🏛️ स्रोत: PIB, भारत सरकार
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7 नवंबर 2025 को भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ है। "माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ" — इस एक पंक्ति ने उन्नीसवीं सदी के अंत से लेकर भारत की स्वाधीनता तक, अनगिनत पीढ़ियों की छाती में देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित की। यह लेख विद्यार्थियों के लिए PIB, भारत सरकार द्वारा जारी विवरण पर आधारित है।

एक नज़र में — मुख्य तथ्य

  • रचना स्वतंत्र कविता के रूप में हुई; बाद में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ (1882) में संकलित की गई।
  • पहली बार प्रकाशन: साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन, 7 नवंबर 1875
  • पहली बार कांग्रेस मंच पर गायन: रवींद्रनाथ टैगोर, कलकत्ता अधिवेशन, 1896
  • राजनीतिक नारे के रूप में पहला उपयोग: 7 अगस्त 1905
  • संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया: 24 जनवरी 1950 — अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा औपचारिक उद्घोषणा।

पृष्ठभूमि — एक कविता से राष्ट्रीय गीत तक

वंदे मातरम् की यात्रा एक साहित्यिक रचना से आरंभ होकर स्वाधीनता-संग्राम की सबसे शक्तिशाली सामूहिक अभिव्यक्तियों में परिवर्तित हुई। सबसे पहले यह बंगदर्शन पत्रिका में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुई — उस समय इसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा। इसी तथ्य की पुष्टि श्री अरबिंदो ने अंग्रेज़ी दैनिक 'बंदे मातरम्' में 16 अप्रैल 1907 के अपने एक लेख में की — कि बंकिम बाबू ने यह गीत "बत्तीस वर्ष पूर्व" रचा था।

इसके बाद वंदे मातरम् पहले बंगदर्शन के मार्च–अप्रैल 1881 अंक में आनंदमठ की धारावाहिक प्रस्तुति की पहली किस्त में, और फिर 1882 में उपन्यास के पुस्तक-रूप में प्रकाशन के साथ पूरे भारत के बौद्धिक मानस तक पहुँचा।

रचयिता — बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (1838–1894)

उन्नीसवीं सदी के बंगाल के सर्वाधिक प्रभावशाली साहित्यकारों में से एक, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय उपन्यासकार, कवि एवं निबंधकार के रूप में आधुनिक बंगाली गद्य तथा उभरते भारतीय राष्ट्रवाद — दोनों के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं —

  • दुर्गेशनंदिनी (1865)
  • कपालकुंडला (1866)
  • आनंदमठ (1882)
  • देवी चौधरानी (1884)

वंदे मातरम् को राष्ट्रवादी चिंतन में "मील का पत्थर" माना जाता है — यह मातृभूमि के प्रति भक्ति एवं आध्यात्मिक आदर्शवाद का अद्वितीय संगम है। बंकिम बाबू ने देश को मातृभूमि-को-माँ के रूप में देखने का नज़रिया दिया, जो अगली पीढ़ियों के राष्ट्रवाद का वैचारिक आधार बना।

आनंदमठ एवं "देशभक्ति का धर्म"

उपन्यास आनंदमठ का मूल कथानक उन "संतान" (अर्थात् बच्चे) कहलाने वाले संन्यासियों के चारों ओर घूमता है, जो अपनी मातृभूमि के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। वे मातृभूमि को देवी-माँ के रूप में पूजते हैं, और वंदे मातरम् इन्हीं "संतानों" द्वारा गाया गया गीत है — "राष्ट्रभक्ति का धर्म" का प्रतीक।

आनंदमठ के मंदिर में मातृभूमि की तीन मूर्तियाँ वर्णित हैं — माँ जो थी (अपनी भव्य महिमा में), माँ जो अभी है (दुःखी, धूल में पड़ी हुई), और माँ जो होगी (भविष्य में पुनः अपनी पुरानी महिमा में प्रतिष्ठित)। श्री अरबिंदो के शब्दों में — "उनकी कल्पना की माँ के 14 करोड़ हाथों में भिक्षा-पात्र नहीं, बल्कि तेज़ धार वाली तलवारें थीं।"

प्रतिरोध का गीत — स्वाधीनता-संग्राम में वंदे मातरम्

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के आरंभ में वंदे मातरम् बढ़ते भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे सुने जाने वाला नारा बन गया। इसने जाति, धर्म एवं भाषा की सीमाओं को पार कर, नेताओं, छात्रों एवं क्रांतिकारियों को एक सूत्र में पिरो दिया।

प्रमुख घटनाएँ — काल-क्रम

  • 1896 — कलकत्ता: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गायन।
  • 7 अगस्त 1905 — कलकत्ता: सभी समुदायों के हज़ारों छात्रों ने टाउन हॉल की ओर जुलूस निकाला; वंदे मातरम् एवं अन्य नारों से आसमान गूंज उठा। विशाल ऐतिहासिक सभा में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार एवं स्वदेशी अपनाने का प्रसिद्ध प्रस्ताव पारित — बंग-भंग के विरुद्ध आंदोलन का प्रारम्भ।
  • 1905 — वाराणसी (INC अधिवेशन): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 'वंदे मातरम्' को पूरे भारत के अवसरों के लिए अपनाया।
  • नवंबर 1905 — रंगपुर (बंगाल): 200 छात्रों पर ₹5-₹5 का जुर्माना — केवल वंदे मातरम् गाने पर।
  • अक्टूबर 1905 — उत्तरी कलकत्ता: "बंदे मातरम् संप्रदाय" की स्थापना; हर रविवार प्रभात-फेरियाँ।
  • अप्रैल 1906 — बारीसाल (अब बांग्लादेश): बंगाल प्रांतीय सम्मेलन पर रोक, प्रतिनिधियों द्वारा अवज्ञा।
  • 20 मई 1906 — बारीसाल: 10,000+ हिन्दू-मुस्लिम नागरिकों का संयुक्त वंदे मातरम् जुलूस।
  • अगस्त 1906: बिपिन चंद्र पाल के संपादन में अंग्रेज़ी दैनिक 'बंदे मातरम्' का प्रकाशन; बाद में श्री अरबिंदो संयुक्त संपादक।
  • मई 1907 — लाहौर: रावलपिंडी में स्वदेशी नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवा-जुलूस; पुलिस-दमन के बावजूद नारे।
  • 27 फ़रवरी 1908 — तूतीकोरिन (तमिलनाडु): कोरल मिल्स के लगभग 1,000 मज़दूरों की स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी के समर्थन में हड़ताल; देर-रात तक वंदे मातरम् के नारे।
  • 1908 — बेलगाम (कर्नाटक): लोकमान्य तिलक की मांडले-प्रस्थान के दिन अनेक किशोरों पर पुलिस-दमन।
  • जून 1908 — बॉम्बे: तिलक के मुक़दमे की सुनवाई पर हज़ारों की भीड़ बाहर जमा; वंदे मातरम् का सामूहिक गान। 21 जून 1914 को तिलक की रिहाई पर पुणे में ज़बरदस्त स्वागत।
  • नवंबर 1906 — धुलिया (महाराष्ट्र): विशाल जन-सभा, वंदे मातरम् के नारे।

विदेशों में गूंज — प्रवासी क्रांतिकारी

  • 1907 — स्टटगार्ट, बर्लिन: मैडम भीकाजी कामा ने भारत के बाहर पहली बार तिरंगा झंडा फहराया — उस पर लिखा था 'वंदे मातरम्'
  • 17 अगस्त 1909 — इंग्लैंड: मदन लाल ढींगरा को फाँसी दी गई; उनके अंतिम शब्द थे — "बंदे मातरम्।"
  • 1909 — पेरिस: प्रवासी देशभक्तों द्वारा जिनेवा से 'बंदे मातरम्' नामक पत्रिका का प्रकाशन।
  • अक्टूबर 1912 — केप टाउन, दक्षिण अफ़्रीका: गोपाल कृष्ण गोखले के आगमन पर विशाल जुलूस, वंदे मातरम् के गगन-भेदी नारे।

राष्ट्रीय गीत का दर्जा — 24 जनवरी 1950

संविधान सभा में जन गण मन एवं वंदे मातरम् दोनों को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाने पर पूर्ण सहमति थी; किसी प्रकार की बहस नहीं हुई। 24 जनवरी 1950 को अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा को अपने ऐतिहासिक वक्तव्य में कहा कि स्वाधीनता-संग्राम में वंदे मातरम् की महती भूमिका के कारण इसे जन-गण-मन के बराबर का दर्जा एवं समान सम्मान दिया जाना चाहिए। इसके अनुसार —

  • जन-गण-मन — भारत का राष्ट्रगान (National Anthem)।
  • वंदे मातरम् — भारत का राष्ट्रीय गीत (National Song), जन-गण-मन के समान सम्मान एवं दर्जा।

150वीं वर्षगाँठ — चार चरणों में भव्य आयोजन

भारत सरकार ने वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ को चार चरणों में मनाने की घोषणा की है।

चरण (Phase) अवधि संदर्भ
चरण 1 7–14 नवंबर 2025 150वीं वर्षगाँठ का शुभारंभ-सप्ताह
चरण 2 19–26 जनवरी 2026 गणतंत्र-दिवस-सप्ताह
चरण 3 7–15 अगस्त 2026 स्वाधीनता-दिवस-सप्ताह
चरण 4 1–7 नवंबर 2026 समापन-सप्ताह

7 नवंबर 2025 — शुभारंभ-दिवस

  • राष्ट्रीय स्तर का उद्घाटन-कार्यक्रम — इंदिरा गांधी स्टेडियम, दिल्ली
  • देश भर में तहसील-स्तर तक VIP कार्यक्रम।
  • स्मारक डाक-टिकट एवं सिक्का का विमोचन।
  • वंदे मातरम् के इतिहास पर प्रदर्शनी एवं लघु फ़िल्म
  • देश-भर के जाने-माने गायकों द्वारा वंदे मातरम् की विविध प्रस्तुतियाँ।

साल-भर की गतिविधियाँ

  • आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर विशेष कार्यक्रम, FM रेडियो-अभियान।
  • PIB — टियर-2 एवं टियर-3 शहरों में पैनल-चर्चा एवं संवाद।
  • विश्व-भर में भारतीय मिशनों पर वंदे मातरम्-समर्पित सांस्कृतिक संध्याएँ।
  • वैश्विक संगीत-समारोह (Global Music Concert) — वंदे मातरम् को समर्पित।
  • "वंदे मातरम् : धरती माँ को सलाम" — वृक्षारोपण-अभियान।
  • राजमार्गों पर देशभक्ति-चित्रांकन; रेलवे स्टेशनों एवं हवाई-अड्डों पर LED-डिस्प्ले।
  • बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय एवं वंदे मातरम् पर 25 × 1-मिनट की लघु-फ़िल्में — सोशल मीडिया के माध्यम से।
  • वंदे मातरम् अभियान + हर घर तिरंगा अभियान — संयुक्त आयोजन।

विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए — हम क्या कर सकते हैं?

  • प्रार्थना-सभा में वंदे मातरम् के इतिहास पर सामूहिक वाचन
  • निबंध एवं वक्तृत्व-प्रतियोगिता — विषय: "वंदे मातरम् — कविता से राष्ट्रगीत तक"।
  • पोस्टर-प्रतियोगिता — आनंदमठ की "संतान" एवं मातृभूमि-भक्ति के विषय पर।
  • बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की अन्य कृतियों का पुस्तकालय-पठन
  • "वंदे मातरम् : धरती माँ को सलाम" — विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण।
"यह गीत केवल शब्द-समूह नहीं — यह उन अनगिनत बलिदानियों की साँसों का संचय है, जिन्होंने इसके दो शब्दों पर अपने प्राण अर्पित कर दिए।"

निष्कर्ष

वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ भारत की राष्ट्रीय पहचान के विकास में इस गीत के गहरे ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व को पुनर्स्मरित करने का अवसर है। एक साहित्यिक पंक्ति से उपनिवेशवाद-विरोधी प्रतिरोध का राष्ट्रीय प्रतीक बनने तक की यह यात्रा, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के विज़न की स्थायी प्रासंगिकता की पुष्टि करती है — और आधुनिक भारत की एकता, आत्मनिर्भरता एवं सांस्कृतिक आत्म-जागरूकता के लिए सतत प्रेरणा-स्रोत बनी हुई है।

स्रोत एवं संदर्भ

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