Light — Reflection and Refraction
जब प्रकाश किरण किसी चिकनी सतह से टकराकर वापस लौटती है तो इस घटना को प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light) कहते हैं।
गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते हैं:
उत्तल दर्पण सदैव आभासी (virtual), सीधा (erect) और छोटा (diminished) प्रतिबिम्ब बनाता है, चाहे वस्तु किसी भी स्थिति पर हो। प्रतिबिम्ब सदैव P और F के बीच बनता है।
जब प्रकाश एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में जाता है तो उसकी दिशा बदल जाती है। इस घटना को अपवर्तन (Refraction) कहते हैं। यह प्रकाश की चाल में परिवर्तन के कारण होता है।
जब प्रकाश किरण काँच के स्लैब (glass slab) से गुजरती है तो निर्गत किरण (emergent ray) आपतित किरण (incident ray) के समानांतर होती है, परंतु पार्श्व विस्थापन (lateral displacement) होता है।
लेंस दो प्रकार के होते हैं:
हल:
दिया है: f = −15 cm, u = −30 cm (चिह्न परिपाटी अनुसार)
दर्पण सूत्र: 1/v + 1/u = 1/f
1/v + 1/(−30) = 1/(−15)
1/v = −1/15 + 1/30 = (−2 + 1)/30 = −1/30
v = −30 cm
प्रतिबिम्ब दर्पण के सामने 30 cm दूरी पर बनता है (C पर), वास्तविक और उल्टा।
आवर्धन m = −v/u = −(−30)/(−30) = −1 (समान आकार, उल्टा)
| सूत्र | विवरण | मात्रक |
|---|---|---|
| R = 2f | वक्रता त्रिज्या = 2 × फोकस दूरी | cm / m |
| 1/v + 1/u = 1/f | दर्पण सूत्र (Mirror Formula) | cm / m |
| m = −v/u = h'/h | दर्पण का आवर्धन (Magnification) | इकाई रहित |
| n = c/v | निरपेक्ष अपवर्तनांक | इकाई रहित |
| n₁ sin i = n₂ sin r | स्नेल का नियम (Snell's Law) | — |
| 1/v − 1/u = 1/f | लेंस सूत्र (Lens Formula) | cm / m |
| m = v/u = h'/h | लेंस का आवर्धन | इकाई रहित |
| P = 1/f | लेंस की क्षमता (f मीटर में) | डाइऑप्टर (D) |
| P = P₁ + P₂ | संयुक्त लेंसों की क्षमता | D |
| गुण | दर्पण (Mirror) | लेंस (Lens) |
|---|---|---|
| सिद्धांत | परावर्तन (Reflection) | अपवर्तन (Refraction) |
| सूत्र | 1/v + 1/u = 1/f | 1/v − 1/u = 1/f |
| आवर्धन | m = −v/u | m = v/u |
| अभिसारी | अवतल (Concave) | उत्तल (Convex) |
| अपसारी | उत्तल (Convex) | अवतल (Concave) |
| क्षमता (Power) | लागू नहीं | P = 1/f (D) |
| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिम्ब की स्थिति | आकार | प्रकृति |
|---|---|---|---|
| अनंत पर | F पर | अत्यंत छोटा | वास्तविक, उल्टा |
| C से परे | F और C के बीच | छोटा | वास्तविक, उल्टा |
| C पर | C पर | समान | वास्तविक, उल्टा |
| F और C के बीच | C से परे | बड़ा | वास्तविक, उल्टा |
| F पर | अनंत पर | अत्यंत बड़ा | वास्तविक, उल्टा |
| P और F के बीच | दर्पण के पीछे | बड़ा | आभासी, सीधा |
मुख्य अक्ष के समानांतर आने वाली प्रकाश किरणें अवतल दर्पण से परावर्तन के बाद जिस बिंदु पर मिलती हैं, उसे मुख्य फोकस (Principal Focus, F) कहते हैं। अवतल दर्पण का फोकस वास्तविक होता है और दर्पण के सामने स्थित होता है।
हल: R = 20 cm
f = R/2 = 20/2 = 10 cm
अवतल दर्पण (Concave Mirror) — जब वस्तु को ध्रुव P और फोकस F के बीच रखा जाए तो सीधा और आवर्धित (बड़ा) प्रतिबिम्ब बनता है। यह प्रतिबिम्ब आभासी होता है।
उत्तल दर्पण को पश्च-दृश्य दर्पण (rear-view mirror) के रूप में वरीयता दी जाती है क्योंकि:
हल: R = 32 cm
f = R/2 = 32/2 = +16 cm
(उत्तल दर्पण की फोकस दूरी धनात्मक होती है)
हल: u = −10 cm, m = −3 (वास्तविक और उल्टा, इसलिए ऋणात्मक)
m = −v/u
−3 = −v/(−10)
−3 = v/10
v = −30 cm
प्रतिबिम्ब दर्पण के सामने 30 cm की दूरी पर बनता है।
प्रकाश के अपवर्तन के दो नियम हैं:
इसका अर्थ है कि निर्वात (या वायु) में प्रकाश की चाल और हीरे में प्रकाश की चाल का अनुपात 2.42 है।
n = c/v = 2.42
अर्थात् हीरे में प्रकाश की चाल निर्वात में प्रकाश की चाल की 1/2.42 गुणा (लगभग 1.24 × 10⁸ m/s) है। हीरे में प्रकाश बहुत धीमी गति से चलता है, इसीलिए हीरे का अपवर्तनांक बहुत अधिक है।
लेंस की क्षमता (Power of Lens): लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभिसरित या अपसरित करने की मात्रा को लेंस की क्षमता कहते हैं।
सूत्र: P = 1/f (जहाँ f मीटर में है)
मात्रक: डाइऑप्टर (Dioptre, D)
1 D = 1 m⁻¹
उत्तल लेंस: P = +ve, अवतल लेंस: P = −ve
हल: P = +1.5 D
f = 1/P = 1/1.5 = +0.667 m = +66.7 cm
चूँकि P धनात्मक है, यह उत्तल लेंस (Convex Lens) है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को दूरदृष्टि दोष (Hypermetropia) है।
हल: h = 2 cm, f = +15 cm, u = −20 cm
लेंस सूत्र: 1/v − 1/u = 1/f
1/v − 1/(−20) = 1/15
1/v + 1/20 = 1/15
1/v = 1/15 − 1/20 = (4 − 3)/60 = 1/60
v = +60 cm (लेंस के दूसरी ओर)
m = v/u = 60/(−20) = −3
h' = m × h = −3 × 2 = −6 cm
प्रतिबिम्ब: लेंस से 60 cm दूरी पर, 6 cm ऊँचा, वास्तविक और उल्टा, 3 गुणा आवर्धित।
अवतल दर्पण से सीधा प्रतिबिम्ब प्राप्त करने के लिए वस्तु को ध्रुव (P) और फोकस (F) के बीच अर्थात् 15 cm से कम दूरी पर रखना होगा।
प्रतिबिम्ब आभासी (virtual), सीधा (erect) और आवर्धित (magnified) होगा। यह दर्पण के पीछे बनेगा।
हल: h = 5 cm, f = −20 cm, u = −30 cm
1/v − 1/u = 1/f
1/v − 1/(−30) = 1/(−20)
1/v + 1/30 = −1/20
1/v = −1/20 − 1/30 = (−3 − 2)/60 = −5/60 = −1/12
v = −12 cm (लेंस के उसी ओर जहाँ वस्तु है)
m = v/u = (−12)/(−30) = +0.4
h' = m × h = 0.4 × 5 = +2 cm
प्रतिबिम्ब: लेंस से 12 cm उसी ओर, 2 cm ऊँचा, आभासी, सीधा और छोटा।
हल: P₁ = +3.5 D, P₂ = −2 D
P = P₁ + P₂ = 3.5 + (−2) = +1.5 D
f = 1/P = 1/1.5 = +0.667 m = +66.7 cm
संयोजन एक उत्तल लेंस (अभिसारी) की भाँति व्यवहार करता है।
हल: n = 1.50, c = 3 × 10⁸ m/s
n = c/v
v = c/n = (3 × 10⁸)/1.50 = 2 × 10⁸ m/s
काँच में प्रकाश की चाल 2 × 10⁸ m/s है।
(i) सभी दूरियाँ दर्पण के ध्रुव (P) से मापी जाती हैं।
(ii) आपतित प्रकाश की दिशा में मापी गई दूरियाँ धनात्मक (+) और विपरीत दिशा में ऋणात्मक (−) होती हैं।
(iii) मुख्य अक्ष के ऊपर की ऊँचाइयाँ धनात्मक और नीचे की ऊँचाइयाँ ऋणात्मक होती हैं।
अवतल दर्पण: (i) शेविंग/श्रृंगार दर्पण (ii) वाहनों की हेडलाइट में परावर्तक के रूप में (iii) सोलर फर्नेस (iv) दंत चिकित्सक का दर्पण
उत्तल दर्पण: (i) वाहनों का पश्च-दृश्य दर्पण (rear-view mirror) (ii) सड़क के मोड़ पर लगे दर्पण — इसका दृष्टि क्षेत्र विस्तृत होता है।
काँच के स्लैब की दोनों सतहें समानांतर हैं। जब प्रकाश किरण पहली सतह से अंदर प्रवेश करती है तो अभिलम्ब की ओर मुड़ती है (विरल → सघन)। जब वही किरण दूसरी सतह से बाहर निकलती है तो अभिलम्ब से दूर उतने ही कोण पर मुड़ती है (सघन → विरल)। चूँकि दोनों सतहें समानांतर हैं, इसलिए निर्गत किरण आपतित किरण के समानांतर होती है, बस पार्श्व विस्थापन (lateral displacement) होता है।
अवतल दर्पण द्वारा वस्तु की 6 विभिन्न स्थितियों में प्रतिबिम्ब बनता है:
(i) वस्तु अनंत पर: समानांतर किरणें F पर मिलती हैं। प्रतिबिम्ब F पर, अत्यंत छोटा, बिंदु आकार, वास्तविक और उल्टा।
(ii) वस्तु C से परे: प्रतिबिम्ब F और C के बीच, छोटा, वास्तविक और उल्टा।
(iii) वस्तु C पर: प्रतिबिम्ब C पर ही, समान आकार, वास्तविक और उल्टा।
(iv) वस्तु F और C के बीच: प्रतिबिम्ब C से परे, बड़ा (आवर्धित), वास्तविक और उल्टा।
(v) वस्तु F पर: परावर्तित किरणें समानांतर हो जाती हैं, प्रतिबिम्ब अनंत पर, अत्यंत बड़ा, वास्तविक और उल्टा।
(vi) वस्तु P और F के बीच: प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे, बड़ा, आभासी और सीधा। यही एकमात्र स्थिति है जहाँ अवतल दर्पण आभासी प्रतिबिम्ब बनाता है।
निष्कर्ष: जैसे-जैसे वस्तु अनंत से ध्रुव की ओर आती है, प्रतिबिम्ब का आकार बढ़ता जाता है और F पर अनंत हो जाता है।
उत्तल लेंस (Convex Lens): बीच में मोटा, किनारों पर पतला। यह अभिसारी लेंस है — समानांतर किरणों को फोकस बिंदु पर केंद्रित करता है। फोकस दूरी और क्षमता दोनों धनात्मक होते हैं। वास्तविक और आभासी दोनों प्रकार के प्रतिबिम्ब बना सकता है।
अवतल लेंस (Concave Lens): बीच में पतला, किनारों पर मोटा। यह अपसारी लेंस है — समानांतर किरणों को फैलाता है। फोकस दूरी और क्षमता दोनों ऋणात्मक होते हैं। सदैव आभासी, सीधा और छोटा प्रतिबिम्ब बनाता है।
लेंस की क्षमता (Power): किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को मोड़ने (अभिसरण/अपसरण) की मात्रा को लेंस की क्षमता कहते हैं। P = 1/f (f मीटर में), मात्रक = डाइऑप्टर (D)
उदाहरण: दो लेंस जिनकी क्षमता +4 D और −1.5 D है, सटे हुए रखे हैं। संयोजन की कुल क्षमता = +4 + (−1.5) = +2.5 D; फोकस दूरी = 1/2.5 = 0.4 m = 40 cm।