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अध्याय 12 · भौतिक विज्ञान

विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव

Magnetic Effects of Electric Current

1. चुंबक और चुंबकीय क्षेत्र (Magnet & Magnetic Field)

प्रत्येक चुंबक (Magnet) के दो ध्रुव (poles) होते हैं — उत्तरी ध्रुव (North Pole, N) और दक्षिणी ध्रुव (South Pole, S)। समान ध्रुव प्रतिकर्षित (repel) और असमान ध्रुव आकर्षित (attract) होते हैं।

चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें चुंबकीय बल का अनुभव होता है, चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) कहलाता है।

चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण (Properties of Magnetic Field Lines):

  • चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ चुंबक के उत्तरी ध्रुव (N) से निकलती हैं और दक्षिणी ध्रुव (S) में प्रवेश करती हैं।
  • चुंबक के अंदर ये रेखाएँ S से N की ओर जाती हैं — अर्थात् ये बंद वक्र (closed curves) बनाती हैं।
  • दो क्षेत्र रेखाएँ कभी भी एक-दूसरे को नहीं काटतीं (यदि काटें तो एक बिंदु पर दो दिशाएँ होंगी, जो असंभव है)।
  • जहाँ रेखाएँ पास-पास होती हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होता है; जहाँ दूर-दूर होती हैं, वहाँ दुर्बल होता है।

2. विद्युत धारावाही चालक का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field due to Current-carrying Conductor)

सन् 1820 में डेनमार्क के भौतिकविद् हैंस क्रिश्चियन ऑर्स्टेड (Hans Christian Oersted) ने खोज की कि विद्युत धारावाही चालक के समीप रखी चुंबकीय सुई विक्षेपित होती है। इससे सिद्ध हुआ कि विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है।

सीधे चालक का चुंबकीय क्षेत्र:

किसी सीधे विद्युत धारावाही चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ संकेंद्रित वृत्तों (concentric circles) के रूप में होती हैं। चालक से दूरी बढ़ने पर क्षेत्र की तीव्रता घटती जाती है।

दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम (Right-Hand Thumb Rule):

  • यदि आप दाहिने हाथ में सीधे चालक तार को इस प्रकार पकड़ें कि अँगूठा विद्युत धारा की दिशा में संकेत करे, तो मुड़ी हुई अँगुलियाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताती हैं।
  • इसे मैक्सवेल का कॉर्कस्क्रू नियम (Maxwell's Corkscrew Rule) भी कहते हैं।

वृत्ताकार कुंडली (Circular Coil) का चुंबकीय क्षेत्र:

धारावाही वृत्ताकार कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ सरल रेखाओं के समान दिखती हैं। कुंडली एक छड़ चुंबक के समान व्यवहार करती है — एक फलक उत्तरी ध्रुव और दूसरा फलक दक्षिणी ध्रुव।

चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता बढ़ाने के उपाय:

  • विद्युत धारा (I) बढ़ाने पर — चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होता है
  • कुंडली में फेरों की संख्या (n) बढ़ाने पर — प्रत्येक फेरे का क्षेत्र जुड़ता है
  • कुंडली के अंदर नर्म लोहे (soft iron) की क्रोड रखने पर — विद्युत चुंबक (Electromagnet) बनता है

परिनालिका (Solenoid):

जब किसी विद्युतरोधी तार को बेलनाकार आकृति में बहुत से फेरों (turns) में लपेटा जाता है तो इसे परिनालिका (Solenoid) कहते हैं। धारा प्रवाहित करने पर परिनालिका छड़ चुंबक की भाँति व्यवहार करती है। इसके भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समानांतर और एकसमान होती हैं।

3. विद्युत धारावाही चालक पर बल (Force on Current-carrying Conductor in Magnetic Field)

फ्रांसीसी वैज्ञानिक आंद्रे मेरी एम्पियर (Andre Marie Ampere) ने बताया कि चुंबकीय क्षेत्र भी विद्युत धारावाही चालक पर बल लगाता है।

फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम (Fleming's Left-Hand Rule):

  • बाएँ हाथ की तर्जनी (index finger), मध्यमा (middle finger) और अँगूठे (thumb) को परस्पर लम्बवत् फैलाएँ।
  • तर्जनी → चुंबकीय क्षेत्र (B) की दिशा
  • मध्यमा → विद्युत धारा (I) की दिशा
  • अँगूठा → बल (F) की दिशा (चालक की गति की दिशा)
  • बल का परिमाण: F = BIL (जहाँ B = चुंबकीय क्षेत्र, I = धारा, L = चालक की लम्बाई)

विद्युत मोटर (Electric Motor):

विद्युत मोटर एक ऐसी युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा (mechanical energy) में बदलती है।

विद्युत मोटर के प्रमुख भाग:

  • आर्मेचर (Armature): नर्म लोहे की क्रोड पर लिपटी विद्युतरोधी ताँबे के तार की कुंडली (ABCD)
  • स्थायी चुंबक (Permanent Magnet): प्रबल चुंबकीय क्षेत्र प्रदान करता है
  • विभक्त वलय (Split Ring / Commutator): दो अर्ध-वलयों (S₁, S₂) से बना — प्रत्येक अर्ध-घूर्णन के बाद कुंडली में धारा की दिशा उलट देता है ताकि कुंडली एक ही दिशा में घूमती रहे।
  • ब्रश (Brushes): कार्बन के — बाह्य परिपथ से विभक्त वलयों तक विद्युत धारा पहुँचाते हैं

विद्युत मोटर का कार्य सिद्धांत:

जब धारावाही कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो कुंडली की भुजाओं (AB और CD) पर विपरीत दिशाओं में बल लगते हैं (फ्लेमिंग के वाम-हस्त नियम से)। ये बल एक बल-युग्म (couple) बनाते हैं जो कुंडली को घुमाता है। विभक्त वलय (commutator) प्रत्येक अर्ध-घूर्णन के बाद धारा की दिशा बदलता है, जिससे कुंडली लगातार एक ही दिशा में घूमती रहती है।

4. विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)

सन् 1831 में अंग्रेज़ वैज्ञानिक माइकल फैराडे (Michael Faraday) ने खोज की कि बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र विद्युत धारा उत्पन्न कर सकता है। इस घटना को विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) कहते हैं।

फैराडे के प्रयोग (Faraday's Experiments):

  • प्रयोग 1: जब छड़ चुंबक को कुंडली के अंदर ले जाते हैं या बाहर निकालते हैं तो गैल्वेनोमीटर में विक्षेप होता है — प्रेरित विद्युत धारा (induced current) उत्पन्न होती है।
  • चुंबक को स्थिर रखने पर कोई धारा उत्पन्न नहीं होती — चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन आवश्यक है।
  • चुंबक की गति की दिशा बदलने पर प्रेरित धारा की दिशा भी बदल जाती है।
  • प्रयोग 2: दो कुंडलियाँ — एक में धारा प्रवाहित करने/रोकने पर दूसरी कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।

फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम (Fleming's Right-Hand Rule):

  • दाहिने हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अँगूठे को परस्पर लम्बवत् फैलाएँ।
  • तर्जनी → चुंबकीय क्षेत्र (B) की दिशा
  • अँगूठा → चालक की गति (v) की दिशा
  • मध्यमा → प्रेरित विद्युत धारा (I) की दिशा
  • यह नियम विद्युत जनित्र (Electric Generator) में प्रयुक्त होता है।

विद्युत जनित्र (Electric Generator):

विद्युत जनित्र एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलती है। यह विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।

विद्युत जनित्र के प्रमुख भाग:

  • आर्मेचर कुंडली (Armature Coil): नर्म लोहे की क्रोड पर लिपटी कुंडली
  • प्रबल स्थायी चुंबक (Strong Permanent Magnet): N और S ध्रुव
  • वलय (Rings): AC जनित्र में — दो सर्पी वलय (slip rings); DC जनित्र में — विभक्त वलय (split ring commutator)
  • ब्रश (Brushes): कार्बन के — कुंडली से बाह्य परिपथ में धारा ले जाते हैं

AC जनित्र vs DC जनित्र:

  • AC जनित्र (Alternating Current Generator): सर्पी वलयों (slip rings) का उपयोग — उत्पन्न धारा की दिशा प्रत्येक अर्ध-घूर्णन के बाद बदलती है → प्रत्यावर्ती धारा (AC)
  • DC जनित्र (Direct Current Generator): विभक्त वलय (commutator) का उपयोग — धारा को सदैव एक ही दिशा में रखता है → दिष्ट धारा (DC)
  • भारत में AC आपूर्ति: 220 V, 50 Hz (1 सेकंड में दिशा 50 बार बदलती है)

5. घरेलू विद्युत परिपथ (Domestic Electric Circuits)

भारत में घरेलू विद्युत आपूर्ति 220 V, 50 Hz की प्रत्यावर्ती धारा (AC) है। विद्युत पावर स्टेशन से तारों (cables) द्वारा घरों तक पहुँचती है।

घरेलू परिपथ की तीन तारें:

  • विद्युन्मय तार / जीवित तार (Live Wire): लाल रंग का आवरण — इसका विभव 220 V (बदलता रहता है) होता है।
  • उदासीन तार (Neutral Wire): काला रंग का आवरण — इसका विभव शून्य (0 V) होता है। विभवांतर = 220 V
  • भू-संपर्क तार (Earth Wire): हरा रंग का आवरण — यह धातु के उपकरणों के बॉडी से जुड़ा होता है और विद्युत रिसाव (leakage) की स्थिति में धारा को ज़मीन में भेजता है — सुरक्षा के लिए

लघुपथन और अतिभारण (Short Circuit & Overloading):

  • लघुपथन (Short Circuit): जब जीवित तार और उदासीन तार सीधे संपर्क में आ जाते हैं (बिना किसी प्रतिरोध/उपकरण के), तो परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है और अत्यधिक धारा प्रवाहित होती है। इससे तार गर्म होकर आग लग सकती है।
  • अतिभारण (Overloading): जब एक ही परिपथ में बहुत अधिक उपकरण जोड़ दिए जाते हैं, तो कुल धारा बहुत बढ़ जाती है। तारों का अत्यधिक तापन होता है।

सुरक्षा युक्तियाँ (Safety Devices):

  • फ्यूज (Fuse): कम गलनांक वाली मिश्रधातु का तार — अत्यधिक धारा पर पिघलकर परिपथ तोड़ देता है। जीवित तार में श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।
  • MCB (Miniature Circuit Breaker): विद्युत चुंबकीय स्विच — अत्यधिक धारा पर स्वतः बंद (trip) हो जाता है। फ्यूज से बेहतर — बार-बार उपयोग किया जा सकता है।
  • भू-संपर्कन (Earthing): धातु के उपकरणों की बॉडी को ज़मीन से जोड़ना — विद्युत रिसाव होने पर धारा ज़मीन में चली जाती है, व्यक्ति को विद्युत आघात (electric shock) नहीं लगता।

⚡ सभी मुख्य बिंदु — Key Points & Quick Revision

महत्वपूर्ण नियम (Important Rules)

नियमउपयोगयाद रखने का तरीका
दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम (Right-Hand Thumb Rule)सीधे धारावाही चालक के चुंबकीय क्षेत्र की दिशादायाँ हाथ: अँगूठा = धारा, अँगुलियाँ = क्षेत्र
फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम (Fleming's Left-Hand Rule)चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल की दिशा (मोटर)बायाँ हाथ: तर्जनी = B, मध्यमा = I, अँगूठा = F
फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम (Fleming's Right-Hand Rule)प्रेरित धारा की दिशा (जनित्र)दायाँ हाथ: तर्जनी = B, अँगूठा = गति, मध्यमा = I

विद्युत मोटर vs विद्युत जनित्र — तुलना

गुणविद्युत मोटर (Electric Motor)विद्युत जनित्र (Electric Generator)
ऊर्जा रूपांतरणविद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जायांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
सिद्धांतचुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बलविद्युत चुंबकीय प्रेरण
नियमफ्लेमिंग का वाम-हस्त नियमफ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम
DC के लिएविभक्त वलय (Commutator)विभक्त वलय (Commutator)
AC के लिएसर्पी वलय (Slip Rings)
उपयोगपंखा, मिक्सर, वॉशिंग मशीनपावर स्टेशन, डीजल जनित्र

घरेलू विद्युत परिपथ — सारांश

विशेषताविवरण
विद्युत आपूर्ति220 V, 50 Hz AC
जीवित तार (Live)लाल रंग, 220 V
उदासीन तार (Neutral)काला रंग, 0 V
भू-संपर्क तार (Earth)हरा रंग, सुरक्षा हेतु
उपकरण जोड़ने का क्रमसमांतर क्रम (Parallel)
सुरक्षा युक्तियाँफ्यूज, MCB, भू-संपर्कन

याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • ऑर्स्टेड ने विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव खोजा (1820)
  • फैराडे ने विद्युत चुंबकीय प्रेरण खोजा (1831)
  • विद्युत मोटर में विभक्त वलय (commutator) — धारा की दिशा उलटता है
  • AC जनित्र में सर्पी वलय (slip rings), DC जनित्र में विभक्त वलय
  • भारत में 50 Hz = प्रति सेकंड 50 चक्र = 1 चक्र = 1/50 s = 0.02 s
  • फ्यूज सदैव जीवित तार (Live Wire) में लगाया जाता है
  • लघुपथन (Short circuit) का कारण: तारों का विद्युतरोधन क्षतिग्रस्त होना
  • परिनालिका (Solenoid) = विद्युत चुंबक का आधार
  • F = BIL — बल, चुंबकीय क्षेत्र, धारा और चालक की लम्बाई पर निर्भर

📖 NCERT प्रश्न-उत्तर — Solutions

पाठ्यपुस्तक प्रश्न (Textbook Questions)

प्रश्न 1: कम्पास (दिक्सूची) की सुई किस प्रकार विक्षेपित होती है जब इसे किसी छड़ चुंबक के निकट लाते हैं?

कम्पास की सुई स्वयं एक छोटा चुंबक है। जब इसे किसी छड़ चुंबक के निकट लाते हैं, तो सुई चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा में विक्षेपित हो जाती है। सुई का उत्तरी ध्रुव चुंबक के दक्षिणी ध्रुव की ओर और सुई का दक्षिणी ध्रुव चुंबक के उत्तरी ध्रुव की ओर आकर्षित होता है। चुंबक से दूर ले जाने पर विक्षेप कम होता जाता है।

प्रश्न 2: चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण लिखिए।

चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के प्रमुख गुण:

  • (i) ये चुंबक के उत्तरी ध्रुव (N) से निकलती और दक्षिणी ध्रुव (S) में प्रवेश करती हैं।
  • (ii) चुंबक के अंदर ये S से N की ओर जाती हैं — ये बंद वक्र (closed curves) होती हैं।
  • (iii) दो क्षेत्र रेखाएँ कभी प्रतिच्छेद (intersect) नहीं करतीं।
  • (iv) जहाँ रेखाएँ घनी होती हैं वहाँ क्षेत्र प्रबल और जहाँ विरल होती हैं वहाँ दुर्बल होता है।
प्रश्न 3: चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को प्रतिच्छेद क्यों नहीं करतीं?

चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करतीं क्योंकि यदि दो क्षेत्र रेखाएँ किसी बिंदु पर प्रतिच्छेद करें, तो उस बिंदु पर कम्पास सुई दो भिन्न दिशाओं में संकेत करेगी, जो असंभव है। किसी भी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की केवल एक ही दिशा संभव है।

प्रश्न 4: मैक्सवेल का दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम (Right-Hand Thumb Rule) लिखिए।

दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम: यदि विद्युत धारावाही सीधे चालक को दाहिने हाथ में इस प्रकार पकड़ें कि अँगूठा विद्युत धारा की दिशा में संकेत करे, तो हाथ की मुड़ी हुई अँगुलियाँ चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताती हैं।

प्रश्न 5: फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम (Fleming's Left-Hand Rule) लिखिए।

फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम: बाएँ हाथ की तर्जनी (index finger), मध्यमा (middle finger) और अँगूठे (thumb) को परस्पर लम्बवत् (mutually perpendicular) फैलाएँ।

  • तर्जनी → चुंबकीय क्षेत्र (B) की दिशा
  • मध्यमा → विद्युत धारा (I) की दिशा
  • अँगूठा → चालक पर लगने वाले बल (F) अर्थात् गति की दिशा

इस नियम का उपयोग विद्युत मोटर में किया जाता है।

प्रश्न 6: विद्युत मोटर का सिद्धांत क्या है? इसके प्रमुख भाग बताइए।

सिद्धांत: जब किसी विद्युत धारावाही कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक बल लगता है (F = BIL) जो कुंडली को घुमाता है। यह विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलता है।

प्रमुख भाग:

  • आर्मेचर (Armature): नर्म लोहे की क्रोड पर तार की कुंडली
  • प्रबल चुंबक: N और S ध्रुव — चुंबकीय क्षेत्र प्रदान करते हैं
  • विभक्त वलय (Split Ring / Commutator): प्रत्येक अर्ध-घूर्णन पर धारा की दिशा उलट देता है
  • ब्रश (Brushes): बाह्य परिपथ से कुंडली तक धारा पहुँचाते हैं
प्रश्न 7: विद्युत मोटर में विभक्त वलय (Split Ring) की क्या भूमिका है?

विभक्त वलय (Split Ring) को दिक्-परिवर्तक (Commutator) भी कहते हैं। इसकी भूमिका:

कुंडली के प्रत्येक अर्ध-घूर्णन (half rotation) के बाद यह कुंडली में विद्युत धारा की दिशा उलट (reverse) देता है। इससे कुंडली की भुजाओं पर लगने वाले बल की दिशा ऐसी बनी रहती है कि कुंडली एक ही दिशा में लगातार घूमती रहे। बिना commutator के, कुंडली अर्ध-घूर्णन के बाद रुक जाएगी।

प्रश्न 8: विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) क्या है?

जब किसी बंद कुंडली (closed coil) से संबद्ध चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन होता है, तो कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित (induced) होती है। इस घटना को विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) कहते हैं।

इसकी खोज माइकल फैराडे ने 1831 में की। यह विद्युत जनित्र (Electric Generator) का आधार है।

प्रश्न 9: विद्युत जनित्र (Electric Generator) का सिद्धांत एवं कार्य विधि समझाइए।

सिद्धांत: विद्युत चुंबकीय प्रेरण — जब कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में घुमाई जाती है तो कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, जिससे प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है।

कार्य विधि: जब कुंडली ABCD को चुंबक के N और S ध्रुवों के बीच घुमाया जाता है, तो भुजाएँ AB और CD चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती हैं। फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त नियम से प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।

AC जनित्र में सर्पी वलय — प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न; DC जनित्र में विभक्त वलय — दिष्ट धारा उत्पन्न।

प्रश्न 10: AC और DC में क्या अंतर है? AC के दो लाभ लिखिए।

AC (प्रत्यावर्ती धारा / Alternating Current): वह विद्युत धारा जिसकी दिशा और परिमाण नियमित अंतराल पर बदलता रहता है। भारत में 50 Hz (प्रति सेकंड 50 बार दिशा बदलती है)।

DC (दिष्ट धारा / Direct Current): वह विद्युत धारा जो सदैव एक ही दिशा में बहती है। जैसे — बैटरी, सेल।

AC के लाभ:

  • (i) AC को ट्रांसफॉर्मर द्वारा उच्च या निम्न वोल्टेज में बदला जा सकता है — लम्बी दूरी तक भेजने में ऊर्जा हानि कम होती है।
  • (ii) AC उत्पन्न करना सरल और सस्ता है (AC जनित्र DC जनित्र से सरल है)।
प्रश्न 11: लघुपथन (Short Circuit) क्या है? इसके क्या कारण हैं?

लघुपथन (Short Circuit): जब जीवित तार (live wire) और उदासीन तार (neutral wire) बिना किसी प्रतिरोध/उपकरण के सीधे संपर्क में आ जाते हैं, तो परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है। V = IR से, R ≈ 0 होने पर I → बहुत अधिक। अत्यधिक धारा से तार अत्यधिक गर्म होकर आग लग सकती है।

कारण:

  • (i) तारों का विद्युतरोधी आवरण क्षतिग्रस्त होना
  • (ii) तारों का ढीला जुड़ाव (loose connection)
  • (iii) नमी या पानी के कारण
प्रश्न 12: भू-संपर्कन (Earthing) का क्या महत्व है?

भू-संपर्कन (Earthing): धातु के विद्युत उपकरणों (जैसे रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, प्रेस) की बॉडी (body) को एक मोटे ताँबे के तार (हरा रंग) द्वारा ज़मीन में गहरे गड़ी तांबे/लोहे की प्लेट से जोड़ा जाता है।

महत्व: यदि उपकरण में विद्युत रिसाव (current leakage) होता है (जैसे जीवित तार उपकरण की बॉडी को छू जाए), तो धारा भू-संपर्क तार से होकर ज़मीन में चली जाती है। इससे उपकरण को छूने वाले व्यक्ति को विद्युत आघात (electric shock) नहीं लगता। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है।

प्रश्न 13: परिनालिका (Solenoid) क्या है? यह छड़ चुंबक की भाँति कैसे व्यवहार करती है?

परिनालिका (Solenoid): किसी विद्युतरोधी (insulated) तार को बेलनाकार (cylindrical) आकृति में कई फेरों (turns) में लपेटकर बनाई गई कुंडली को परिनालिका कहते हैं।

जब इसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो:

  • परिनालिका के अंदर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समानांतर और एकसमान होती हैं।
  • एक सिरा उत्तरी ध्रुव (N) और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव (S) की भाँति व्यवहार करता है।
  • इसका चुंबकीय क्षेत्र पैटर्न छड़ चुंबक जैसा होता है।

यदि इसके अंदर नर्म लोहे की छड़ (soft iron core) रखी जाए तो यह विद्युत चुंबक (Electromagnet) बन जाती है।

प्रश्न 14: फ्यूज (Fuse) और MCB में क्या अंतर है?

फ्यूज (Fuse):

  • कम गलनांक वाली मिश्रधातु (ताँबा-टिन/सीसा-टिन) का तार
  • अत्यधिक धारा पर पिघलकर परिपथ तोड़ देता है
  • एक बार पिघलने पर बदलना पड़ता है

MCB (Miniature Circuit Breaker):

  • विद्युत चुंबकीय स्विच (electromagnetic switch)
  • अत्यधिक धारा पर स्वतः ट्रिप (trip) हो जाता है
  • पुनः ON किया जा सकता है — बार-बार उपयोग संभव
  • फ्यूज से अधिक सुविधाजनक और सुरक्षित
प्रश्न 15: विद्युत चुंबक (Electromagnet) और स्थायी चुंबक (Permanent Magnet) में अंतर लिखिए।

विद्युत चुंबक (Electromagnet):

  • नर्म लोहे की क्रोड पर तार लपेटकर बनाया जाता है
  • धारा प्रवाहित करने पर ही चुंबक बनता है — अस्थायी
  • चुंबकीय शक्ति बदली जा सकती है (धारा बदलकर)
  • ध्रुव बदले जा सकते हैं (धारा की दिशा बदलकर)

स्थायी चुंबक (Permanent Magnet):

  • इस्पात या विशेष मिश्रधातुओं से बनता है — स्थायी
  • विद्युत धारा की आवश्यकता नहीं
  • चुंबकीय शक्ति स्थिर रहती है
  • ध्रुव बदले नहीं जा सकते

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बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ चुंबक के किस ध्रुव से निकलती हैं?
  • A) दक्षिणी ध्रुव (S)
  • B) दोनों ध्रुवों से
  • C) उत्तरी ध्रुव (N)
  • D) मध्य भाग से
✅ सही उत्तर: C) उत्तरी ध्रुव (N) — चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ N ध्रुव से निकलती हैं और S ध्रुव में प्रवेश करती हैं।
2. विद्युत मोटर में ऊर्जा का रूपांतरण होता है:
  • A) यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
  • B) विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा
  • C) ऊष्मा ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
  • D) विद्युत ऊर्जा → ऊष्मा ऊर्जा
✅ सही उत्तर: B) विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा — विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा (घूर्णन) में बदलती है।
3. भारत में घरेलू विद्युत आपूर्ति की आवृत्ति (Frequency) है:
  • A) 60 Hz
  • B) 100 Hz
  • C) 220 Hz
  • D) 50 Hz
✅ सही उत्तर: D) 50 Hz — भारत में AC आपूर्ति 220 V, 50 Hz की है। प्रति सेकंड दिशा 50 बार (100 बार — प्रत्येक चक्र में 2 बार) बदलती है।
4. विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) की खोज किसने की?
  • A) माइकल फैराडे
  • B) ऑर्स्टेड
  • C) एम्पियर
  • D) फ्लेमिंग
✅ सही उत्तर: A) माइकल फैराडे — फैराडे ने 1831 में विद्युत चुंबकीय प्रेरण की खोज की। ऑर्स्टेड ने 1820 में विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव खोजा।
5. घरेलू विद्युत परिपथ में भू-संपर्क तार (Earth Wire) का रंग है:
  • A) लाल
  • B) काला
  • C) हरा
  • D) नीला
✅ सही उत्तर: C) हरा — जीवित तार = लाल, उदासीन तार = काला, भू-संपर्क तार = हरा।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer)

1. ऑर्स्टेड के प्रयोग का वर्णन कीजिए। इससे क्या निष्कर्ष निकला?

ऑर्स्टेड का प्रयोग (1820): ऑर्स्टेड ने एक विद्युत धारावाही सीधे चालक तार के निकट एक चुंबकीय सुई (कम्पास) रखी। उन्होंने देखा कि:

(i) धारा प्रवाहित करने पर सुई विक्षेपित हुई।

(ii) धारा की दिशा बदलने पर विक्षेप की दिशा भी उलट गई।

(iii) धारा बंद करने पर सुई अपनी मूल स्थिति में आ गई।

निष्कर्ष: विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। विद्युत और चुंबकत्व परस्पर संबंधित हैं।

2. विद्युत जनित्र में AC और DC उत्पन्न करने में क्या अंतर है?

AC जनित्र: इसमें सर्पी वलय (Slip Rings) — दो पूर्ण वलय — उपयोग होते हैं। कुंडली घूमने पर प्रेरित धारा की दिशा प्रत्येक अर्ध-घूर्णन के बाद बदलती रहती है → प्रत्यावर्ती धारा (AC) प्राप्त होती है।

DC जनित्र: इसमें विभक्त वलय (Split Ring Commutator) उपयोग होता है। यह प्रत्येक अर्ध-घूर्णन के बाद बाह्य परिपथ में धारा की दिशा उलट देता है ताकि बाह्य परिपथ में धारा सदैव एक ही दिशा में बहे → दिष्ट धारा (DC) प्राप्त होती है।

3. परिनालिका (Solenoid) को प्रबल विद्युत चुंबक कैसे बनाया जा सकता है?

परिनालिका को प्रबल विद्युत चुंबक बनाने के उपाय:

(i) परिनालिका में विद्युत धारा (I) बढ़ाकर — अधिक धारा = प्रबल चुंबकीय क्षेत्र

(ii) कुंडली में फेरों की संख्या (n) बढ़ाकर — प्रत्येक फेरे का चुंबकीय क्षेत्र जुड़ता है

(iii) परिनालिका के अंदर नर्म लोहे (soft iron) की क्रोड रखकर — नर्म लोहा चुंबकीय क्षेत्र को कई गुना बढ़ा देता है → विद्युत चुंबक (Electromagnet) बनता है

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer)

1. विद्युत मोटर और विद्युत जनित्र की कार्य विधि, सिद्धांत, भागों और उपयोगों की तुलना कीजिए। चित्र की सहायता से समझाइए।

विद्युत मोटर (Electric Motor):

सिद्धांत: चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल लगता है (F = BIL)। फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम से बल की दिशा निर्धारित होती है।

ऊर्जा रूपांतरण: विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा

भाग: आर्मेचर (कुंडली), स्थायी चुंबक, विभक्त वलय (commutator), ब्रश

कार्य: कुंडली की भुजाओं पर विपरीत दिशाओं में बल → बल-युग्म → कुंडली घूमती है। Commutator प्रत्येक अर्ध-घूर्णन पर धारा की दिशा उलटता है।

उपयोग: पंखा, मिक्सर, वॉशिंग मशीन, विद्युत ड्रिल, कूलर

विद्युत जनित्र (Electric Generator):

सिद्धांत: विद्युत चुंबकीय प्रेरण — बदलते चुंबकीय क्षेत्र में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है। फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम से प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात होती है।

ऊर्जा रूपांतरण: यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

भाग: आर्मेचर कुंडली, प्रबल चुंबक, सर्पी वलय (AC) या विभक्त वलय (DC), ब्रश

कार्य: कुंडली को बाह्य बल (जल, भाप, पवन) से चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है → चुंबकीय फ्लक्स बदलता है → प्रेरित EMF और धारा उत्पन्न होती है।

उपयोग: विद्युत उत्पादन — ताप विद्युत संयंत्र, जलविद्युत संयंत्र, पवन ऊर्जा संयंत्र, डीज़ल जनित्र

2. घरेलू विद्युत परिपथ का विस्तृत वर्णन कीजिए। विभिन्न सुरक्षा उपायों — फ्यूज, MCB, भू-संपर्कन — का महत्व समझाइए। लघुपथन और अतिभारण क्या हैं?

घरेलू विद्युत परिपथ:

भारत में 220 V, 50 Hz AC आपूर्ति पावर स्टेशन से ओवरहेड या भूमिगत केबलों द्वारा घरों तक पहुँचती है।

तीन तारें: (i) जीवित तार (Live — लाल, 220V) (ii) उदासीन तार (Neutral — काला, 0V) (iii) भू-संपर्क तार (Earth — हरा, सुरक्षा)

घर में दो अलग परिपथ होते हैं — एक 5A (पंखे, बल्ब, TV) और दूसरा 15A (हीटर, गीज़र, AC)। सभी उपकरण समांतर क्रम में जुड़े होते हैं।

लघुपथन (Short Circuit): जब जीवित और उदासीन तार बिना प्रतिरोध के सीधे मिल जाते हैं। कारण — विद्युतरोधन क्षतिग्रस्त, तार ढीले। परिणाम — R ≈ 0, I → अत्यधिक, तार गर्म → आग।

अतिभारण (Overloading): एक ही परिपथ में बहुत अधिक उपकरण जोड़ने पर कुल धारा बहुत बढ़ जाती है। तार अत्यधिक गर्म → खतरनाक।

सुरक्षा उपाय:

(i) फ्यूज: कम गलनांक वाली मिश्रधातु का तार, जीवित तार में श्रेणीक्रम में — अत्यधिक धारा पर पिघलता है।

(ii) MCB: विद्युत चुंबकीय स्विच — स्वतः ट्रिप होता है, बार-बार उपयोग संभव।

(iii) भू-संपर्कन (Earthing): धातु के उपकरणों की बॉडी को ज़मीन से जोड़ना — रिसाव धारा ज़मीन में जाती है, व्यक्ति सुरक्षित।

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